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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/67/1

142 Sukta
3 Mantra
6/67/1
Devata- चन्द्रः, इन्द्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
परि॒ वर्त्मा॑नि स॒र्वत॒ इन्द्रः॑ पू॒षा च॑ सस्रतुः। मुह्य॑न्त्व॒द्यामूः सेना॑ अमित्राणां परस्त॒राम् ॥

परि॑ । वर्त्मा॑नि । स॒र्वत॑: । इन्द्र॑: । पू॒षा । च॒ । स॒स्र॒तु॒: । मुह्य॑न्तु । अ॒द्य । अ॒मू: । सेना॑:। अ॒मित्रा॑णाम् । प॒र॒:ऽत॒राम् ॥६७.१॥

Mantra without Swara
परि वर्त्मानि सर्वत इन्द्रः पूषा च सस्रतुः। मुह्यन्त्वद्यामूः सेना अमित्राणां परस्तराम् ॥

परि । वर्त्मानि । सर्वत: । इन्द्र: । पूषा । च । सस्रतु: । मुह्यन्तु । अद्य । अमू: । सेना:। अमित्राणाम् । पर:ऽतराम् ॥६७.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. राष्ट्र में शत्रुओं से मोर्चा लेनेवाला 'इन्द्र' है। सैनिकों की भोजन-व्यवस्था को ठीक रखनेवाला 'पूषा' है। (इन्द्रः पूषा च) = ये इन्द्र और पूषा (सर्वत:) = सब दिशाओं में (वर्त्मानि) = सञ्चरण मार्गों को (परिसस्त्रतुः) = चारों ओर से निरुद्ध करके गति करते हैं। शत्रुओं को प्रवेश के लिए द्वार उपलब्ध नहीं होता। २. (अद्य) = अब (अमू:) = वे दूर पर दिखाई देती हुई (अमित्राणां सेना:) = शत्रुओं की सेनाएँ-रथ, तुरग, पदाति आदि (परस्तराम्) = अशियेन-बहुत ही (मुहान्तु) = व्यामूढचित्त कार्याकार्य-ज्ञान-शून्य हो जाएँ।
Essence
सेनापति व अन्नाध्यक्ष सब ओर से मार्गों पर गति करते हुए शत्रु-सैन्यों के लिए मार्गों को निरुद्ध कर दें। शत्र-सैन्य मूढ बनकर आक्रमण करने का साहस छोड़ बैठे।
Subject
इन्द्रः पूषा