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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 6/63/4

142 Sukta
4 Mantra
6/63/4
Devata- अग्निः Rishi- द्रुह्वण Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वर्चोबलप्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
संस॒मिद्यु॑वसे वृष॒न्नग्ने॒ विश्वा॑न्य॒र्य आ। इ॒डस्प॒दे समि॑ध्यसे॒ स नो॒ वसू॒न्या भ॑र ॥

सम्ऽस॑म् । इत् । यु॒व॒से॒ । वृ॒ष॒न् । अग्ने॑ । विश्वा॑नि । अ॒र्य: । आ । इ॒ड: । प॒दे । सम् । इ॒ध्य॒से॒ । स: । न॒: । वसू॑नि । आ । भ॒र॒ ॥६३.४॥

Mantra without Swara
संसमिद्युवसे वृषन्नग्ने विश्वान्यर्य आ। इडस्पदे समिध्यसे स नो वसून्या भर ॥

सम्ऽसम् । इत् । युवसे । वृषन् । अग्ने । विश्वानि । अर्य: । आ । इड: । पदे । सम् । इध्यसे । स: । न: । वसूनि । आ । भर ॥६३.४॥

Meaning
१. विद्यार्थी आचार्य से कहता है कि हे (वृषन्) = मुझे ज्ञान-जल से सिक्त करनेवाले, (अग्ने) = मुझे आगे-और-आगे ले-चलनेवाले आचार्य! (अर्य:) = आप जितेन्द्रिय हो और सब ज्ञानों के स्वामी हो। (इत्) = निश्चय से (सम्) = सम्यक् और (सं आ युवसे) = अच्छी प्रकार ही मुझे बुराइयों से पृथक् करते हो और अच्छाई के साथ जोड़ते हो। २. आप (इड:पदे) = इस ज्ञान की बाणी के मार्ग में (समिध्यसे) = खूब ही चमकते हो। (सः) = वे आप (न:) = हमारे लिए (वसूनि) = इन जान-साधनों को (आभर) = समन्तात् भूत कीजिए। हमें ज्ञानदीस करके उस ज्ञानाग्नि में सब निति-बन्धनों को भस्म कर दीजिए।
Essence
ज्ञानदीप्त आचार्य हमें ज्ञानसिक्त करके सब बुराइयों से पृथक् करें।

 
Subject
'वृषा, अग्रि, अर्य' आचार्य
Special
यह ज्ञानदीस व्यक्ति स्थितप्रज्ञ बनता है। इसकी मति विषयों से आन्दोलित नहीं होती। इसी से यह अथर्वा' कहलाता है। यह अथर्वा ही अगले छह सूक्तों का ऋषि है।

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