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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/63/1

142 Sukta
4 Mantra
6/63/1
Devata- निर्ऋतिः Rishi- द्रुह्वण Chhanda- जगती Suktam- वर्चोबलप्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
यत्ते॑ दे॒वी निरृ॑तिराब॒बन्ध॒ दाम॑ ग्री॒वास्व॑विमो॒क्यं यत्। तत्ते॒ वि ष्या॒म्यायु॑षे॒ वर्च॑से॒ बला॑यादोम॒दमन्न॑मद्धि॒ प्रसू॑तः ॥

यत् । ते॒ । दे॒वी । नि:ऽऋ॑ति: । आ॒ऽब॒बन्ध॑ । दाम॑ । ग्री॒वासु॑ । अ॒वि॒ऽमो॒क्यम् । यत् । तत् । ते॒ । वि । स्या॒मि॒ । आयु॑षे । वर्च॑से । बला॑य । अ॒दो॒म॒दम् । अन्न॑म् । अ॒ध्दि॒। प्रऽसू॑त: ॥६३.१॥

Mantra without Swara
यत्ते देवी निरृतिराबबन्ध दाम ग्रीवास्वविमोक्यं यत्। तत्ते वि ष्याम्यायुषे वर्चसे बलायादोमदमन्नमद्धि प्रसूतः ॥

यत् । ते । देवी । नि:ऽऋति: । आऽबबन्ध । दाम । ग्रीवासु । अविऽमोक्यम् । यत् । तत् । ते । वि । स्यामि । आयुषे । वर्चसे । बलाय । अदोमदम् । अन्नम् । अध्दि। प्रऽसूत: ॥६३.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे पुरुष! (देवी) = तुझे पराजित करने की कामनावाली [दिव विजिगीषा] अथवा तुझे मद की अवस्था में ले जानेवाली (निर्ऋति:) = इस अनिष्टकारिणी पापदेवता ने (ते) = तेरी (ग्रीवासु) = कण्ठगत धमनियों में-तेरी गर्दन में (यत्) = जिस (अविमोक्यम्) = कठिनता से छुड़ाये जाने योग्य (दाम) = रज्जू को-पाश को (आबबन्ध) = बाधा है, (ते) = तेरे (तत्) = उस पाश को (विष्यामि) = मैं छुड़ाता हूँ। गतमन्त्र के अनुसार वेदाध्ययन की प्रवृत्ति हमें इस निति के पाश से छुड़ानेवाली होगी। २. इस निऋति के पाश से मुक्त होकर तू (प्रसूत:) = इस वेदवाणी से प्रेरित हुआ हुआ (अदोमदम्) = अनन्तकाल तक व्यास होनेवाले-आनन्द प्राप्त करानेवाले (अन्नम् अद्धि) = ज्ञान का ओदन खा। 'ब्रह्माचारी'-ज्ञान को चरनेवाला बन, 'आ-चार्य' तुझे इस ज्ञान को चराएँ। यह तेरे (आयुषे) = दीर्घजीवन के लिए हो, (वर्चसे) = प्राणशक्ति के लिए हो तथा बलाय-तुझे बल सम्पन्न करे।
Essence
हम वेदाध्यन द्वारा अपने को निति के पाश से मुक्त करें। अनन्त आनन्द प्राप्त करानेवाले ज्ञान को प्राप्त करें। ब्रह्मौदन के खानेवाले बनें। यह हमें 'दीर्घजीवन, प्राणशक्ति व बल' प्राप्त कराए।
Subject
'अदो-मदं' अन्नम्