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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/60/1

142 Sukta
3 Mantra
6/60/1
Devata- अर्यमा Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- पतिलाभ सूक्त
Mantra with Swara
अ॒यमा या॑त्यर्य॒मा पु॒रस्ता॒द्विषि॑तस्तुपः। अ॒स्या इ॒च्छन्न॒ग्रुवै॒ पति॑मु॒त जा॒याम॒जान॑ये ॥

अ॒यम् । आ । या॒ति॒ । अ॒र्य॒मा । पु॒रस्ता॑त् । विसि॑तऽस्तुप: । अ॒स्यै । इ॒च्छन् । अ॒ग्रुवै॑ । पति॑म् । उ॒त । जा॒याम् । अ॒जान॑ये ॥६०.१॥

Mantra without Swara
अयमा यात्यर्यमा पुरस्ताद्विषितस्तुपः। अस्या इच्छन्नग्रुवै पतिमुत जायामजानये ॥

अयम् । आ । याति । अर्यमा । पुरस्तात् । विसितऽस्तुप: । अस्यै । इच्छन् । अग्रुवै । पतिम् । उत । जायाम् । अजानये ॥६०.१॥

Meaning
१. (पुरस्तात्) = पूर्व दिशा में (वि-षित-स्तुप:) = विशेषरूप से बंधा हुआ है रश्मियों का समुच्य जिसमें, ऐसा (अयम्) = यह (अर्यमा) = सूर्य (आयाति) = आता है। रश्मि-समूह से युक्त सूर्य पूर्व दिशा में उदित होता है। यह सूर्य इस कन्या को भी एक-एक दिन करके यौवन प्राप्त करता है और आज (अस्यै अगृवै) = इस अविवाहित युवति के लिए (पतिम्) = पति को चाहता है, (उत) = और (अजानये) = जायारहित युवक के लिए (जायाम्) = पत्नी को चाहता हुआ यह सूर्य आता है। २. सूर्य अपनी प्रकाशमयी किरणों से युवक व युवतियों को यौवन प्राप्त कराता है और उनमें एक-दूसरे को प्राप्त करने की कामना जगाता है, मानो सूर्य ही इस कार्य को करनेवाला हो। वस्तुत: कन्या का पिता भी 'अर्यमा' है-('अर्यमेति तमाहुर्यों ददाति') = जो कन्या के हाथ को पति के हाथ में देते हैं तथा 'अरीन् यच्छति' नाम-क्रोध-लोभ आदि का नियमन करते हैं, साथ ही सूर्य की भाँति 'विषितस्तुप'-अपने अन्दर ज्ञानरश्मियों के समुच्छ्य को बाँधनेवाले होते हैं।
Essence
आदर्श पिता सूर्य के समान है। वह अपनी युवति कन्या के लिए पति की कामना करता हुआ एक उत्तम युवक के लिए कन्या का हाथ ग्रहण कराता है।
Subject
विषितस्तुप 'अर्यमा'

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