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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/52/2

142 Sukta
3 Mantra
6/52/2
Devata- गावः Rishi- भागलि Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- भैषज्य सूक्त
Mantra with Swara
नि गावो॑ गो॒ष्ठे अ॑सद॒न्नि मृ॒गासो॑ अविक्षत। न्यू॒र्मयो॑ न॒दीनं॒ न्यदृष्टा॑ अलिप्सत ॥

नि । गाव॑: । गो॒ऽस्थे । अ॒स॒द॒न् । नि । मृ॒गास॑: । अ॒वि॒क्ष॒त॒ । नि । ऊ॒र्मय॑: । न॒दीना॑म् । नि । अ॒दृष्टा॑: । अ॒लि॒प्स॒त॒ ॥५२.२॥

Mantra without Swara
नि गावो गोष्ठे असदन्नि मृगासो अविक्षत। न्यूर्मयो नदीनं न्यदृष्टा अलिप्सत ॥

नि । गाव: । गोऽस्थे । असदन् । नि । मृगास: । अविक्षत । नि । ऊर्मय: । नदीनाम् । नि । अदृष्टा: । अलिप्सत ॥५२.२॥

Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार सूर्य-सम्पर्क से स्वस्थ शरीरवाले व्यक्ति के जीवन में (गावः) = इन्द्रियाँ (गोष्ठ) = शरीररूप गोष्ठ में (नि असदन) = निश्चय से स्थित होती हैं। ये विषयों में भटकती नहीं रहती। अब (मृगास:) = ये आत्मान्वेषण की वृत्तिवाले व्यक्ति (नि अविक्षत) = हृदयान्तरिक्ष में ही प्रवेश करनेवाले होते हैं। २. इन (नदीनाम्) = प्रभु का स्तवन करनेवालों की (ऊर्मयः) = 'शोकमोही क्षुत्पिपासे जरामृत्यू षर्मय:'-छह ऊर्मियाँ, अर्थात् जीवन-समुद्र में उठनेवाली शोक-मोह, भूख-प्यास, जरा व मृत्युरूप छह तरङ्गे (नि अदृष्ट:) = निश्चय से अदृष्ट हो जाती हैं। इनके जीवन में ये छह तरङ्गे नहीं उठती। ये तो (नि अलिप्सत) = निश्चय से उस आत्मतत्त्व को ही पाने की कामनावाले होते हैं।
Essence
स्वस्थ पुरुष की इन्द्रियाँ विषयों में नहीं भटकतीं। ये आत्मान्वेषक हृदयान्तरिक्ष में प्रवेश करते हैं। इनके जीवन समुद्र में शोक-मोह आदि की तरङ्गे नहीं उठतीं। ये निश्चय ही प्रभु-प्राप्ति की कामनाबाले होते हैं।
Subject
अन्तर्मुख-यात्रा

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