Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/52/1

142 Sukta
3 Mantra
6/52/1
Devata- सूर्यः Rishi- भागलि Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- भैषज्य सूक्त
Mantra with Swara
उत्सूर्यो॑ दि॒व ए॑ति पु॒रो रक्षां॑सि नि॒जूर्व॑न्। आ॑दि॒त्यः पर्व॑तेभ्यो वि॒श्वदृ॑ष्टो अदृष्ट॒हा ॥

उत् । सूर्य॑: । दि॒व: । ए॒ति॒ । पु॒र: । रक्षां॑सि । नि॒ऽजूर्व॑न् । आ॒दि॒त्य: । पर्व॑तेभ्य: । वि॒श्वऽदृ॑ष्ट: । अ॒दृ॒ष्ट॒ऽहा ॥५२.१॥

Mantra without Swara
उत्सूर्यो दिव एति पुरो रक्षांसि निजूर्वन्। आदित्यः पर्वतेभ्यो विश्वदृष्टो अदृष्टहा ॥

उत् । सूर्य: । दिव: । एति । पुर: । रक्षांसि । निऽजूर्वन् । आदित्य: । पर्वतेभ्य: । विश्वऽदृष्ट: । अदृष्टऽहा ॥५२.१॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. (सूर्यः) = सबको कर्मों में प्रेरक यह सूर्य (पुर:) = सामने-पूर्व दिशा में (रक्षांसि) = हमारे शरीर में उपद्रव करनेवाले रोगकृमियों को (निजूर्वन्) = नितरां हिंसित करता हुआ (दिव: उत् एति) = अन्तरिक्ष प्रदेश से उदित होता है। २. वह (आदित्य:) = भूपृष्ठ से जलों का आदान करनेवाला सूर्य (पर्वतेभ्यः) = मेघों के लिए उदित होता है। जलों को वाष्पीभूत करके ऊपर ले-जाता हुआ यह सूर्य मेषों की उत्पत्ति का कारण बनता है। यह (विश्वदृष्टः) = सब प्राणियों से देखा जाता है, और (अदृष्टहा) = अदृष्ट रोगकृमियों का भी विनाशक है।
Essence
उदय होता हुआ सूर्य रोगकृमियों का संहार करता है। यह मेघों के निर्माण में कारण बनता है।
Subject
सूर्य: