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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/51/1

142 Sukta
3 Mantra
6/51/1
Devata- आपः Rishi- शन्ताति Chhanda- गायत्री Suktam- एनोनाशन सूक्त
Mantra with Swara
वा॒योः पू॒तः प॒वित्रे॑ण प्र॒त्यङ्सोमो॒ अति॑ द्रु॒तः। इन्द्र॑स्य॒ युजः॒ सखा॑ ॥

वा॒यो: । पू॒त: । प॒वित्रे॑ण । प्र॒त्यङ् । सोम॑: । अति॑ । द्रु॒त: । इन्द्र॑स्य । युज्य॑:। सखा॑ ॥५१.१॥

Mantra without Swara
वायोः पूतः पवित्रेण प्रत्यङ्सोमो अति द्रुतः। इन्द्रस्य युजः सखा ॥

वायो: । पूत: । पवित्रेण । प्रत्यङ् । सोम: । अति । द्रुत: । इन्द्रस्य । युज्य:। सखा ॥५१.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (वायो:) = [वातः प्राणो भूत्वा०] प्राणसाधना द्वारा (पूतः) = पवित्र हुआ-हुआ तथा (पवित्रेण) = [नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते] ज्ञान के द्वारा-ज्ञान साधना-निरन्तर स्वाध्याय द्वारा (प्रत्यङ्) = [प्रतिमुखम् अञ्चन्] वापस शरीर में गतिवाला होता हुआ (सोमः) = शरीर में उत्पन्न रेत:कण (अतिद्रुतः) = नाभिदेश को लाँघकर ऊर्ध्व गतिवाला होता है। सोम-रक्षण के प्रमुख साधन हैं-प्राणायाम और स्वाध्याय। २. यह सुरक्षित सोम (इन्द्रस्य) = इस जितेन्द्रिय पुरुष का (युज्यः सखा) = परमात्म-प्राप्ति का साधनभूत मित्र है। सोम-रक्षण द्वारा बुद्धि की तीव्रता होकर प्रभु का दर्शन होता है।

 
Essence
सोम के रक्षण व ऊर्ध्वगमन के लिए हम प्राणसाधना व स्वाध्याय में प्रवृत्त हों। जितेन्द्रिय बनकर हम सोम का रक्षण करेंगे तो यह हमारी बुद्धि को सूक्ष्म बनाकर हमें प्रभु दर्शन के योग्य बनाएगा।
Subject
सोम