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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/49/3

142 Sukta
3 Mantra
6/49/3
Devata- अग्निः Rishi- गार्ग्य Chhanda- विराड्जगती Suktam- अग्निस्तवन सूक्त
Mantra with Swara
सु॑प॒र्णा वाच॑मक्र॒तोप॒ द्यव्या॑ख॒रे कृष्णा॑ इषि॒रा अ॑नर्तिषुः। नि यन्नि॒यन्ति॒ उप॑रस्य॒ निष्कृ॑तिं पु॒रू रेतो॑ दधिरे सूर्यश्रितः ॥

सु॒ऽप॒र्णा: । वाच॑म् । अ॒क्र॒त॒ । उप॑ । द्यवि॑ । आ॒ऽख॒रे । कृष्णा॑: । इ॒षि॒रा: । अ॒न॒र्ति॒षु॒: । नि । यत् । नि॒ऽयन्ति॑ । उप॑रस्य । नि:ऽकृ॑तिम् । पु॒रु । रेत॑: । द॒धि॒रे॒ । सू॒र्य॒ऽश्रित॑: ॥४९.३॥

Mantra without Swara
सुपर्णा वाचमक्रतोप द्यव्याखरे कृष्णा इषिरा अनर्तिषुः। नि यन्नियन्ति उपरस्य निष्कृतिं पुरू रेतो दधिरे सूर्यश्रितः ॥

सुऽपर्णा: । वाचम् । अक्रत । उप । द्यवि । आऽखरे । कृष्णा: । इषिरा: । अनर्तिषु: । नि । यत् । निऽयन्ति । उपरस्य । नि:ऽकृतिम् । पुरु । रेत: । दधिरे । सूर्यऽश्रित: ॥४९.३॥

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Meaning
१.(सुपर्णा:) = गतमन्त्र में वर्णित उत्तमता से अपना पालन व पूरण करनेवाले लोग (उप द्यवि वाचम् अक्रत) = उस ज्योतिर्मय प्रभु के समीप आसीन हुए-हुए स्तुति-वाणियाँ बोलते हैं। (आखरे) = अपने निवास स्थान में (कृष्णा:) =  अच्छाइयों को अपनी ओर आकृष्ट करनेवाले (इषिरा:) = ये गतिशील व्यक्ति (अनिर्तिषुः) = अपने कर्त्तव्यकों में नृत्य करते हैं-प्रभु की उपासना के द्वारा अपने जीवन को उत्तम बनाते हुए ये सदा गतिशील होते हैं। २. (यत्) = जब ये (नि) = निश्चय से यज्ञों के द्वारा (उपरस्य) = मेष की (निष्कृतिम्) = उत्पत्ति [सम्पादन] को (नियन्ति) = प्राप्त होते हैं, तब ये (सूर्यश्रित:) = ज्ञान के सूर्य का सेवन करनेवाले उपासक (पुरु) = पालन व पूरण करनेवाले (रेत:) = शक्तिकणों को (दधिरे) = धारण करते हैं। यज्ञों द्वारा ये मेघों की उत्पत्ति का कारण बनते हैं और ज्ञान-प्रधान जीवन बिताते हुए शक्ति-कणों को अपने अन्दर धारण करते हैं।
Essence
हम उत्तमता से अपना पालन व पूरण करें-प्रभु की उपासना करें-कर्त्तव्यकर्मों में लगे रहें। यज्ञों के द्वारा मेघों के निर्माण में भागी बनें। ज्ञान-साधना में प्रवृत्त हुए-हुए शक्ति का रक्षण करें।
Subject
सुपर्णा
Special
इस सक्त का 'गाय:' चूहों आदि से यव-क्षेत्रों का रक्षण करता हुआ तथा यवादि सात्त्विक अन्नों का भोजन करता हुआ 'अथर्वा' बनता है और प्रार्थना करता है कि -