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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/48/2

142 Sukta
3 Mantra
6/48/2
Devata- ऋभुः Rishi- प्रचेता Chhanda- उष्णिक् Suktam- स्वस्तिवाचन सूक्त
Mantra with Swara
ऋ॒भुर॑सि॒ जग॑च्छन्दा॒ अनु॒ त्वा र॑भे। स्व॒स्ति मा॒ सं व॑हा॒स्य य॒ज्ञस्यो॒दृचि॒ स्वाहा॑ ॥

ऋ॒भु: । अ॒सि॒ । जग॑त्ऽछन्दा: । अनु॑ । त्वा॒ । आ । र॒भे॒ । स्व॒स्ति । मा॒ । सम् । व॒ह॒ । अ॒स्य । य॒ज्ञस्य॑ । उ॒त्ऽऋचि॑ । स्वाहा॑ ॥४८.२॥

Mantra without Swara
ऋभुरसि जगच्छन्दा अनु त्वा रभे। स्वस्ति मा सं वहास्य यज्ञस्योदृचि स्वाहा ॥

ऋभु: । असि । जगत्ऽछन्दा: । अनु । त्वा । आ । रभे । स्वस्ति । मा । सम् । वह । अस्य । यज्ञस्य । उत्ऽऋचि । स्वाहा ॥४८.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
२. (ऋभः असि) = [ऋतेन भाति]तु सत्य वेदज्ञान से दीस जीवनवाला है। इस तृतीय सवन में तू (जगच्छन्द:) = सम्पूर्ण जगती के हित की कामनावाला हुआ है। (त्वा अनु आरभे) = मैं तेरा लक्ष्य करके ही जीवन की क्रियाओं को आरम्भ करता हूँ। [ख] आप मुझे इस सवन की अन्तिम ऋचा तक कल्याणपूर्वक ले-चलिए। मैं आपके प्रति अपना अर्पण करता हूँ।
Essence
जीवन के प्रात:सवन में हम श्येन-खूब ही ज्ञान की रुचिवाले व प्राणरक्षण की इच्छावाले हों। माध्यन्दिन सवन में 'काम-क्रोध-लोभ' को रोकने की इच्छावाले तथा अपने में शक्ति का सेचन करनेवाले हों। तृतीय सवन में ज्ञानी बनकर ज्ञान-प्रसार द्वारा जगती के हित में प्रवृत्त हों। प्रभुकृपा से हमारे तीनों सवन पूर्ण हों।
Subject
श्येन, ऋभु, वृषा
Special
जो मनुष्य ज्ञान के निगरण से जीवन का प्रारम्भ करता है [ब्रह्मचारी-ज्ञान को चरनेवाला] और ज्ञानोपदेश में ही जीवन के अन्तिम भाग को लगाता है [गिरति-उपदिशति] वह गर्ग व गर्ग-पुत्र 'गाय' कहलाता है। यह गाये ही अगले सूक्त का ऋषि है