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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/48/1

142 Sukta
3 Mantra
6/48/1
Devata- श्येनः Rishi- अङ्गिरस् Chhanda- उष्णिक् Suktam- स्वस्तिवाचन सूक्त
Mantra with Swara
श्ये॒नोऽसि॑ गाय॒त्रच्छ॑न्दा॒ अनु॒ त्वा र॑भे। स्व॒स्ति मा॒ सं व॑हा॒स्य य॒ज्ञस्यो॒दृचि॒ स्वाहा॑ ॥

श्ये॒न: । अ॒सि॒ । गा॒य॒त्रऽछ॑न्दा: । अनु॑ । त्वा॒ । आ । र॒भे॒ । स्व॒स्ति । मा॒ । सम् । व॒ह॒ । अ॒स्य । य॒ज्ञस्य॑ । उ॒त्ऽऋचि॑ । स्वाहा॑ ॥४८.१॥

Mantra without Swara
श्येनोऽसि गायत्रच्छन्दा अनु त्वा रभे। स्वस्ति मा सं वहास्य यज्ञस्योदृचि स्वाहा ॥

श्येन: । असि । गायत्रऽछन्दा: । अनु । त्वा । आ । रभे । स्वस्ति । मा । सम् । वह । अस्य । यज्ञस्य । उत्ऽऋचि । स्वाहा ॥४८.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. जीवन के प्रात:सवन में तू (श्येनः असि) = [श्यायतेनिकर्मणः] खूब ही ज्ञान प्रास करनेवाला है। (गायत्रच्छन्दा:) = तू गायत्र छन्दवाला है [गयाः प्राणाः, तान् तत्रे] प्राणशक्ति के रक्षण की प्रबल कामनावाला है। (त्वा अनु आरभे) = तेरा लक्ष्य करके मैं जीवन की क्रियाओं को आरम्भ करता हूँ। मेरी सब क्रियाएँ उस गायत्र सवन को सम्यक् पूर्ण करने की दृष्टि से होती हैं। [क] हे प्रभो! आप (मा) = मुझे (अस्य यज्ञस्य उदृचि) = इस प्रात:सवन नामक यज्ञ की अन्तिम ऋचा तक, अर्थात् समासि तक (स्वस्ति संवह) = सम्यक् कल्याण प्राप्त कराइए। इसके लिए मैं (स्वाहा) = आपके प्रति अपना अर्पण करता हूँ।
Essence
जीवन के प्रात:सवन में हम श्येन-खूब ही ज्ञान की रुचिवाले व प्राणरक्षण की इच्छावाले हों। माध्यन्दिन सवन में 'काम-क्रोध-लोभ' को रोकने की इच्छावाले तथा अपने में शक्ति का सेचन करनेवाले हों। तृतीय सवन में ज्ञानी बनकर ज्ञान-प्रसार द्वारा जगती के हित में प्रवृत्त हों। प्रभुकृपा से हमारे तीनों सवन पूर्ण हों।
Subject
श्येन, ऋभु, वृषा
Special
जो मनुष्य ज्ञान के निगरण से जीवन का प्रारम्भ करता है [ब्रह्मचारी-ज्ञान को चरनेवाला] और ज्ञानोपदेश में ही जीवन के अन्तिम भाग को लगाता है [गिरति-उपदिशति] वह गर्ग व गर्ग-पुत्र 'गाय' कहलाता है। यह गाये ही अगले सूक्त का ऋषि है