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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/45/1

142 Sukta
3 Mantra
6/45/1
Devata- दुःष्वप्ननाशनम् Rishi- अङ्गिरस् Chhanda- पथ्यापङ्क्तिः Suktam- दुःष्वप्ननाशन
Mantra with Swara
प॒रोऽपे॑हि मनस्पाप॒ किमश॑स्तानि शंससि। परे॑हि॒ न त्वा॑ कामये वृ॒क्षां वना॑नि॒ सं च॑र गृ॒हेषु॒ गोषु॑ मे॒ मनः॑ ॥

प॒र: । अप॑ । इ॒हि॒ । म॒न॒:ऽपा॒प॒ । किम् । अश॑स्तानि । शं॒स॒सि॒ । परा॑ । इ॒हि॒ । न । त्वा॒ । का॒म॒ये॒ । वृ॒क्षान् । वना॑नि । सम् । च॒र॒ । गृ॒हेषु॑ । गोषु॑ । मे॒ । मन॑: ॥४५.१॥

Mantra without Swara
परोऽपेहि मनस्पाप किमशस्तानि शंससि। परेहि न त्वा कामये वृक्षां वनानि सं चर गृहेषु गोषु मे मनः ॥

पर: । अप । इहि । मन:ऽपाप । किम् । अशस्तानि । शंससि । परा । इहि । न । त्वा । कामये । वृक्षान् । वनानि । सम् । चर । गृहेषु । गोषु । मे । मन: ॥४५.१॥

Meaning
१. हे (मनस्पाप) = मन के पाप! मन में उत्पन्न होनेवाले पाप-विचार ! तू (परः अप इहि) = यहाँ से परे-दूर चला जा, (किम्) = क्यों तू (अशस्तानि) = अशुभ बातों को शंससि-प्रशंसित करता है। २. (परा इहि) = तू दूर ही चला जा। (त्वा न कामये) = मैं तुझे नहीं चाहता। (वृक्षान् वनानि) = संचर-तू वृक्षों व वनों में भटकनेवाला हो, (मे मनः) = मेरा मन तो (गृहेषु) = घरों में घर के कार्यों में और (गोषु) = गौओं में अथवा ज्ञान की वाणियों में लगा हुआ है। मुझे तेरे लिए अवकाश नहीं है।
Essence
हे अशुभ का शंसन करनेवाले मनस्पाप! तू मुझसे दूर चला जा। मेरा मन तो घर के कार्यों व गौओं में लगा है। मुझे तेरे लिए अवकाश नहीं। खाली व्यक्ति के मन में ही अशुभ भावों का उदय होता है।
Subject
गृहेषु गोषु मे मनः

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