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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/44/3

142 Sukta
3 Mantra
6/44/3
Devata- वनस्पतिः Rishi- विश्वामित्र Chhanda- त्रिपदा महाबृहती Suktam- रोगनाशन सूक्त
Mantra with Swara
रु॒द्रस्य॒ मूत्र॑मस्य॒मृत॑स्य॒ नाभिः॑। वि॑षाण॒का नाम॒ वा अ॑सि पितॄ॒णां मूला॒दुत्थि॑ता वातीकृत॒नाश॑नी ॥

रु॒द्रस्य॑ । मूत्र॑म् । अ॒सि॒ । अ॒मृत॑स्य । नाभि॑: । वि॒ऽसा॒न॒का । नाम॑ । वै । अ॒सि॒ । पि॒तृ॒णाम् । मूला॑त् । उत्थि॑ता । वा॒ती॒कृ॒त॒ऽनाश॑नी ॥४४.३॥

Mantra without Swara
रुद्रस्य मूत्रमस्यमृतस्य नाभिः। विषाणका नाम वा असि पितॄणां मूलादुत्थिता वातीकृतनाशनी ॥

रुद्रस्य । मूत्रम् । असि । अमृतस्य । नाभि: । विऽसानका । नाम । वै । असि । पितृणाम् । मूलात् । उत्थिता । वातीकृतऽनाशनी ॥४४.३॥

Meaning
१. हे विषाणके! तू सदस्य-[रोदयति] इस रुलानेवाले भीषण रोग की मूत्रम् असि-[मुच् ष्ट्रन] छुड़ानेवाली है अमृतस्य नाभि:-हमारे जीवनों में नीरोगता को बाँधनेवाली है [णह बन्धने] । विषाणका नाम वा असि-'विषाणका' यह निश्चय से तेरा नाम है। तू विशेषेण सम्भजनीया है [षण सम्भक्तौ]। २. पितॄणां मूलात् उत्थिता-पालक ओषधियों के मूल से तू उत्पन्न हुई है, वातीकृतनाशनी-वातविकार से होनेवाले सब कष्टों का निवारण करनेवाली है।
Essence
विषाणका नामक ओषधि भीषण रोगों से छुड़ानेवाली, नीरोगता देनेवाली व वात विकारों को नष्ट करनेवाली है।
Subject
विषाणका वातीकृतनाशनी
Special
नीरोग बनकर यह 'अङ्गिराः' बनता है। इसका मस्तिष्क भी ज्ञानोज्ज्वल होता है, अर्थात् यह 'प्रचेताः' कहलाता है, मन में यह 'यम:'-संयमवाला होता है। अगले चार सूक्तों का यही ऋषि है। यह निष्पाप जीवनवाला बनता हुआ कहता है -

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