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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/43/3

142 Sukta
3 Mantra
6/43/3
Devata- मन्युशमनम् Rishi- भृग्वङ्गिरा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- मन्युशमन सूक्त
Mantra with Swara
वि ते॑ हन॒व्यां श॒रणिं॒ वि ते॒ मुख्यां॑ नयामसि। यथा॑व॒शो न वादि॑षो॒ मम॑ चि॒त्तमु॒पाय॑सि ॥

वि । ते॒ । ह॒न॒व्या᳡म् । श॒रणि॑म् । वि । ते॒ । मुख्या॑म् । न॒या॒म॒सि॒ । यथा॑ । अ॒व॒श: । न ।‍ वादि॑ष: । मम॑ । चि॒त्तम् । उ॒प॒ऽआय॑सि ॥४३.३॥

Mantra without Swara
वि ते हनव्यां शरणिं वि ते मुख्यां नयामसि। यथावशो न वादिषो मम चित्तमुपायसि ॥

वि । ते । हनव्याम् । शरणिम् । वि । ते । मुख्याम् । नयामसि । यथा । अवश: । न ।‍ वादिष: । मम । चित्तम् । उपऽआयसि ॥४३.३॥

Meaning
१. हे क्रोधाविष्ट पुरुष! (ते हनव्याम्) = तेरी हनु सम्बन्धी (शरणिम्) = हिंसा-हेतुभूत क्रोधा भिव्यञ्जक धमनि को (विनयामसि) = विनीत करते हैं-दूर करते हैं, तथा (ते) = तेरी (मुख्याम्) = मुख पर उत्पन्न होनेवाली, क्रोधवश उत्पन्न नाड़ी को भी (वि) = विनीत करते हैं, २. (यथा) = जिससे (अवश:) = क्रोध के परवश हुआ-हुआ तू (न वादिष:) = व्यर्थ नहीं बोलता और (मम चित्तम् उपायसि) = मेरे मन को समीपता से प्रास होता है।
Essence
दर्भ के प्रयोग से हम क्रोधाविष्ट के क्रोध को शान्त करें, जिससे यह व्यर्थ न बोलता हुआ अनुकूल मनवाला हो।
Subject
हनव्या मुख्यां शरणिं विनयामसि
Special
क्रोधशून्य जीवनवाला यह व्यक्ति सबका मित्र 'विश्वामित्र' बनता है। इसका शरीर भी नीरोग है। यही अगले सूक्त का ऋषि है।

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