Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/39/1

142 Sukta
3 Mantra
6/39/1
Devata- बृहस्पतिः, त्विषिः Rishi- अथर्वा Chhanda- जगती Suktam- वर्चस्य सूक्त
Mantra with Swara
यशो॑ ह॒विर्व॑र्धता॒मिन्द्र॑जूतं स॒हस्र॑वीर्यं॒ सुभृ॑तं॒ सह॑स्कृतम्। प्र॒सर्स्रा॑ण॒मनु॑ दी॒र्घाय॒ चक्ष॑से ह॒विष्म॑न्तं मा वर्धय ज्ये॒ष्ठता॑तये ॥

यश॑: । ह॒वि: । व॒र्ध॒ता॒म् । इन्द्र॑ऽजूतम् । स॒हस्र॑ऽवीर्यम् । सुऽभृ॑तम् । सह॑:ऽकृतम् । प्र॒ऽसर्स्रा॑णम् ।अनु॑ । दी॒र्घाय॑ । चक्ष॑से ।ह॒विष्म॑न्तम् । मा॒ । व॒र्ध॒य॒ । ज्ये॒ष्ठऽता॑तये ॥३९.१॥

Mantra without Swara
यशो हविर्वर्धतामिन्द्रजूतं सहस्रवीर्यं सुभृतं सहस्कृतम्। प्रसर्स्राणमनु दीर्घाय चक्षसे हविष्मन्तं मा वर्धय ज्येष्ठतातये ॥

यश: । हवि: । वर्धताम् । इन्द्रऽजूतम् । सहस्रऽवीर्यम् । सुऽभृतम् । सह:ऽकृतम् । प्रऽसर्स्राणम् ।अनु । दीर्घाय । चक्षसे ।हविष्मन्तम् । मा । वर्धय । ज्येष्ठऽतातये ॥३९.१॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. (यश:) = यश की कारणभूत (हवि:) = दानपूर्वक अदन की वृत्ति (वर्धताम्) = हमारे जीवनों में वृद्धि प्राप्त करे । हम त्यागपूर्वक अदन-[खाने]-वाले बनें और इसप्रकार यशस्वी जीवनवाले हों। यह हवि (इन्द्रजूतम्) = प्रभु द्वारा प्रेरित की गई है-प्रभु ने त्यागपूर्वक अदन की प्रेरणा दी है। यह हवि (सहस्त्रवीर्यम्) = हमें अनन्त शक्ति प्राप्त कराती है, (सुभृतम्) = [शोभनं भृतं येन] यह हमारा उत्तम भरण करती है, (सहस्कृतम्) = बल के उद्देश्य से यह दी गई है-यह शत्रुओं का पराभव करानेवाला बल देती है। २. हे प्रभो! (अनु) = इस हवि के वर्धन के बाद (हविष्मन्तं मा) = प्रशस्त हविवाले मुझ (प्रसाणम्) = खूब गतिशील को (दीर्घाय चक्षसे) = चिरकालभावी दर्शन के लिए दीर्घजीवन के लिए तथा (ज्येष्ठतातये) = सर्वश्रेष्ठ्य के लिए (वर्धय) = बढ़ाइए। हवि को अपनाता हुआ मैं दीर्घजीवन और सर्वश्रेष्ठता को प्राप्त करूँ।
Essence
प्रभु ने हमें त्यागपूर्वक अदन की प्रेरणा दी है। यह हवि ही हमारे दीर्घजीवन का कारण बनती है और हमें सर्वश्रेष्ठ बनाती है।
Subject
दीर्घजीवन व सर्वश्रेष्ठता