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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/37/3

142 Sukta
3 Mantra
6/37/3
Devata- चन्द्रमाः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शापनाशन सूक्त
Mantra with Swara
यो नः॒ शपा॒दश॑पतः॒ शप॑तो॒ यश्च॑ नः॒ शपा॑त्। शुने॒ पेष्ट्र॑मि॒वाव॑क्षामं॒ तं प्रत्य॑स्यामि मृ॒त्यवे॑ ॥

य: । न॒: । शपा॑त् । अश॑पत: । शप॑त: ।य: । च॒ । न॒: । शपा॑त् । शुने॑ । पेष्ट्र॑म्ऽइव । अव॑ऽक्षामम् । तम् । प्रति॑ । अ॒स्या॒मि॒ । मृ॒त्यवे॑ ॥३७.३॥

Mantra without Swara
यो नः शपादशपतः शपतो यश्च नः शपात्। शुने पेष्ट्रमिवावक्षामं तं प्रत्यस्यामि मृत्यवे ॥

य: । न: । शपात् । अशपत: । शपत: ।य: । च । न: । शपात् । शुने । पेष्ट्रम्ऽइव । अवऽक्षामम् । तम् । प्रति । अस्यामि । मृत्यवे ॥३७.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. समाज में कोई ऐसा व्यक्ति उपस्थित हो जाता है जो समाज के लिए हानिकर होता है। कई बार विवशता में समाज उसके लिए निन्दा का प्रस्ताव उपस्थित करता है। उस समय के लिए कहते हैं कि (यः) = जो (अशपत:) = किसी प्रकार के शाप का प्रयोग न करते हुए (न: शपात्) = हमें शाप देता है (च) = अथवा (य:) = जो (शपत:) = विवशता में निन्दा का प्रस्ताव करनेवाले (न:) = हमें (शपात्) = बुरा-भला कहता है, तो (शुने) = कुत्ते के लिए (अवक्षामम्) = सूखे (पेष्ट्रम्) = [piece] टुकड़ों की (इव) = भाँति (तम्) = उसे (मृत्यवे प्रत्यस्यामि) = मृत्यु के लिए फेंकता हैं, अर्थात् यह गाली देनेवाला व्यक्ति सारे समाज से दूषित किये जाने पर क्षीण होकर मृत्यु का शिकार हो जाता है।
Essence
जो सारे समाज के लिए विद्वेष का कारण बनता है, यह समाज से निन्दित किया जाकर उदासीनता के कारण क्षीण होकर मृत्यु का ग्रास बन जाता है।
Subject
शुने पेष्ट्रम् इव अवक्षामम्