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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/36/1

142 Sukta
3 Mantra
6/36/1
Devata- अग्निः Rishi- अथर्वा Chhanda- गायत्री Suktam- वैश्वनार सूक्त
Mantra with Swara
ऋ॒तावा॑नं वैश्वान॒रमृ॒तस्य॒ ज्योति॑ष॒स्पति॑म्। अज॑स्रं घ॒र्ममी॑महे ॥

ऋ॒तऽवा॑नम् । वै॒श्वा॒न॒रम्। ऋ॒तस्य॑ । ज्योति॑ष: । पति॑म् । अज॑स्रम्। घ॒र्मम् । ई॒म॒हे॒ ॥३६.१॥

Mantra without Swara
ऋतावानं वैश्वानरमृतस्य ज्योतिषस्पतिम्। अजस्रं घर्ममीमहे ॥

ऋतऽवानम् । वैश्वानरम्। ऋतस्य । ज्योतिष: । पतिम् । अजस्रम्। घर्मम् । ईमहे ॥३६.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (ऋतावानम्) = प्रशस्त यज्ञोंवाले [ऋत-यज्ञ], (वैश्वानरम्) = सब मनुष्यों के हितकारी, (ऋतस्य) = [Right] नियमितता के व (ज्योतिष:) = ज्ञानज्योति के (पतिम) = रक्षक प्रभु से (अजस्त्र घर्मम्) = हमें न छोड़ जानेवाले-सदा हमारे साथ रहनेवाले तेज को (ईमहे) = माँगते हैं। वस्तुत: इस 'अजस्त्र धर्म' की प्राप्ति का उपाय यही है कि हम भी 'यज्ञशील, सब मनुष्यों के हित में प्रवृत्त तथा भौतिक क्रियाओं में सूर्य-चन्द्र की भाँति नियमिततावाले तथा ज्ञान की रुचिवाले' बनें। ऐसा बनने पर ही शरीर में शक्ति का रक्षण होता है और हमें 'अजस्त्र धर्म' की प्राप्ति होती है।
Essence
हम उस प्रभु का स्मरण करें जो यज्ञरूप हैं, सबका हित करनेवाले हैं, लोक लोकान्तरों को नियमितता से ले-चल रहे हैं, ज्ञान के पति हैं। इसप्रकार प्रभु-स्मरण करते हुए हम 'अक्षीण शक्ति' को प्राप्त करें।

 
Subject
अजस्त्र घर्मम्