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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/33/3

142 Sukta
3 Mantra
6/33/3
Devata- इन्द्रः Rishi- जाटिकायन Chhanda- गायत्री Suktam- इन्द्रस्तव सूक्त
Mantra with Swara
स नो॑ ददातु॒ तां र॒यिमु॒रुं पि॒शङ्ग॑संदृशम्। इन्द्रः॒ पति॑स्तु॒विष्ट॑मो॒ जने॒ष्वा ॥

स: । न॒: । द॒दा॒तु॒ । ताम् । र॒यिम् । उ॒रुम् । पि॒शङ्ग॑ऽसंदृशम् । इन्द्र॑:। पति॑: । तु॒विऽत॑म: । जने॑षु । आ ॥३३.३॥

Mantra without Swara
स नो ददातु तां रयिमुरुं पिशङ्गसंदृशम्। इन्द्रः पतिस्तुविष्टमो जनेष्वा ॥

स: । न: । ददातु । ताम् । रयिम् । उरुम् । पिशङ्गऽसंदृशम् । इन्द्र:। पति: । तुविऽतम: । जनेषु । आ ॥३३.३॥

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Meaning
१. (स:) = वह (इन्द्र न:) = हमारे लिए (तां रयिम्) = उस ज्ञानरूप धन को (ददातु) = दे जोकि (उरुम्) = विशाल है, (पिशङ्ग-सन्दुशम्) = तेज:स्वरूप, प्रभापटल के रूप में प्रकट होनेवाला है। २. (इन्द्रः) = वे परमैश्वर्यशाली प्रभु ही (पति:) = हमारे रक्षक है-ज्ञानेश्वर्य प्राप्त कराके हमें शत्रुओं के आक्रमण से बचाते हैं। (तुविःतमः) = सब प्रकार के उत्कर्षवाले हैं-महान् व प्रवृद्ध हैं। (जनेषु आ) = सब मनुष्यों में समन्तात् सत्तावाले हैं।
Essence
वे 'तुवि:तमः' प्रभु 'विशाल, तेज:स्वरूप, प्रभापटल के रूप में प्रकट होनेवाले' हमारे लिए ज्ञानधन प्राप्त कराके हमारा रक्षण करते हैं।
Subject
'उरुं पिशंगसन्दृशं रयिम्
Special
ज्ञान-धन प्राप्त करके सब शत्रुओं का विनाश करनेवाला यह व्यक्ति 'चातन' नामवाला होता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है।