Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/33/2

142 Sukta
3 Mantra
6/33/2
Devata- इन्द्रः Rishi- जाटिकायन Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- इन्द्रस्तव सूक्त
Mantra with Swara
नाधृ॑ष॒ आ द॑धृषते धृषा॒णो धृ॑षि॒तः शवः॑। पु॒रा यथा॑ व्य॒थिः श्रव॒ इन्द्र॑स्य॒ नाधृ॑षे॒ शवः॑ ॥

न । आ॒ऽधृ॒षे॒ । आ । द॒धृ॒ष॒ते॒ । धृ॒षा॒ण: । धृ॒षि॒त: । शव॑: । पु॒रा ।यथा॑ । व्य॒थि:। श्रव॑: । इन्द्र॑स्य । न । आ॒ऽधृ॒षे॒ । शव॑: । ३३.२॥

Mantra without Swara
नाधृष आ दधृषते धृषाणो धृषितः शवः। पुरा यथा व्यथिः श्रव इन्द्रस्य नाधृषे शवः ॥

न । आऽधृषे । आ । दधृषते । धृषाण: । धृषित: । शव: । पुरा ।यथा । व्यथि:। श्रव: । इन्द्रस्य । न । आऽधृषे । शव: । ३३.२॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. वह इन्द्र (न आधृषे) = औरों से अभिभूत नहीं होता, (आदधृषते) = यह शत्रुओं को समन्तात् धर्षण करनेवाला होता है, (धृषाण:) = यह शत्रुओं का धर्षण करनेवाला है ही। (धृषित:) = [धृषितं] (शवः) = इसका बल शत्रुओं का धर्षक है [धूषितं अस्य अस्ति]। २. (इन्द्रस्य) = इस शत्रु-संहारक प्रभु का (अव:) = ज्ञान (पुरा यथा) = पहले की भाँति, अर्थात् सदा से (व्यथि:) = शत्रुओं को पीड़ित करनेवाला है। प्रभु का ज्ञान हमारे सब शत्रुओं का संहारक है। वस्तुत: उस प्रभु का (शव:) = बल (न आधृषे) = कभी भी शत्रुओं से धर्षणीय नहीं होता।
Essence
हम प्रभु का ज्ञान प्राप्त करते हुए प्रभु के बल को धारण करते हैं और इसप्रकार शत्रुओं से धर्षणीय नहीं होते।

 
Subject
शत्रुधर्षक बल