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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/31/3

142 Sukta
3 Mantra
6/31/3
Devata- गौः Rishi- उपरिबभ्रव Chhanda- गायत्री Suktam- गौ सूक्त
Mantra with Swara
त्रिं॒शद्धामा॒ वि रा॑जति॒ वाक्प॑त॒ङ्गो अ॑शि॒श्रिय॑त्। प्रति॒ वस्तो॒रह॒र्द्युभिः॑ ॥

त्रिं॒शत् । धाम॑ । व‍ि । रा॒ज॒ति॒ । वाक् । प॒त॒ङ्ग: । अ॒शि॒श्रि॒य॒त् । प्रति॑ । वस्तो॑: । अह॑: । द्युऽभि॑: ॥३१.३॥

Mantra without Swara
त्रिंशद्धामा वि राजति वाक्पतङ्गो अशिश्रियत्। प्रति वस्तोरहर्द्युभिः ॥

त्रिंशत् । धाम । व‍ि । राजति । वाक् । पतङ्ग: । अशिश्रियत् । प्रति । वस्तो: । अह: । द्युऽभि: ॥३१.३॥

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Meaning
१. यह (वाक्) = प्रभु के नामों व स्तोत्रों का उच्चारण करनेवाला (पतङ्ग) = [पतन गच्छति] स्फूर्ति से क्रियाओं को करनेवाला साधक (अशिश्रियत्) = [श्री सेवायाम्] प्रभु का उपासन करता है और (प्रतिवस्तो:) = प्रतिदिन (अहः द्युभि:) दिन की दीतियों से, न कि रात्रि के अन्धकारों से (त्रिंशद्धाम) = तीसों धाम-आठों प्रहर (विराजति) = देदीप्यमान होता है।
Essence
हम प्रभु का उपासन करें, क्रियाशील बनें। यही चमकने का मार्ग है। प्रकाशमय जीवन में पाप नहीं होते।
Subject
वाक् पतङ्ग
Special
यह यज्ञमय जीवनवाला पुरुष अग्निहोत्र आदि यज्ञों में प्रवृत्त हुआ-हुआ रोगकृमियों का संहार करनेवाला 'चातन' कहलाता है। स्वस्थ एवं शान्त वृत्तिवाला बनकर यह 'अथर्वा' न डॉवाडोल होता है। अगले सूक्त के प्रथम दो मन्त्रों का ऋषि 'चातन है, तीसरे का 'अथर्वा'।