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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/31/2

142 Sukta
3 Mantra
6/31/2
Devata- गौः Rishi- उपरिबभ्रव Chhanda- गायत्री Suktam- गौ सूक्त
Mantra with Swara
अ॒न्तश्च॑रति रोच॒ना अ॒स्य प्रा॒णाद॑पान॒तः। व्यख्यन्महि॒षः स्वः ॥

अ॒न्त: । च॒र॒ति॒ । रो॒च॒ना । अ॒स्य । प्रा॒णात् । अ॒पा॒न॒त: । वि । अ॒ख्य॒त् । म॒हि॒ष: । स्व᳡: ॥३१.२॥

Mantra without Swara
अन्तश्चरति रोचना अस्य प्राणादपानतः। व्यख्यन्महिषः स्वः ॥

अन्त: । चरति । रोचना । अस्य । प्राणात् । अपानत: । वि । अख्यत् । महिष: । स्व: ॥३१.२॥

Meaning
१. (प्राणात्) = प्राण से और (अपानतः) = अपान से, अर्थात् प्राणापान की साधना के द्वारा (अस्य) = इस साधक के (अन्त:) = अन्दर-हदयदेश में (रोचना) = दीसि (चरति) = विचरती है। प्राणायाम द्वारा इसका अन्त:करण दीस हो उठता है। २. यह (महिष:) = प्रभुपूजन करनेवाला साधक (स्वः) = स्वयं देदीप्यमान ज्योति प्रभु को (व्यख्यत्) = देखता है। यह ज्ञानदीत हृदय में प्रभु के प्रकाश को देखनेवाला होता है।
Essence
हम प्राणसाधना द्वारा दीस हृदयदेश में प्रभु की ज्योति को देखनेवाले बनें।

 
Subject
महिषः

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