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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/31/1

142 Sukta
3 Mantra
6/31/1
Devata- गौः Rishi- उपरिबभ्रव Chhanda- गायत्री Suktam- गौ सूक्त
Mantra with Swara
आयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒दस॑दन्मा॒तरं॑ पु॒रः। पि॒तरं॑ च प्र॒यन्त्स्वः॑ ॥

आ । अ॒यम् । गौ: । पृश्नि॑: । अ॒क्र॒मी॒त् । अस॑दत् । मा॒तर॑म् । पु॒र: । पि॒तर॑म् । च॒ । प्र॒ऽयन् । स्व᳡: ॥३१.१॥

Mantra without Swara
आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः। पितरं च प्रयन्त्स्वः ॥

आ । अयम् । गौ: । पृश्नि: । अक्रमीत् । असदत् । मातरम् । पुर: । पितरम् । च । प्रऽयन् । स्व: ॥३१.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (अयम्) = यह-गतसूक्त के अनुसार यवादि सात्त्विक अन्नों का सेवन करनेवाला व्यक्ति (गौः) = [गच्छति] क्रियाशील होता है, (पृश्नि:) = [संस्प्रष्टा भासाम्-नि० २.१४] ज्ञान-ज्योति का स्पर्श करनेवाला होता है। यह (आ अक्रमीत) = समन्तात् अपने कर्त्तव्यकर्मों में गतिवाला होता है। यह (मातरम्) = वेदमाता को (पुरः) = सदा अपने सामने स्थापित करके उसकी प्रेरणा के अनुसार (असदत्) = गतिवाला होता है। आगमदीप-दृष्ट मार्ग से ही गति करता है। २. इसप्रकार शास्त्र प्रमाणक बनकर-शास्त्र विधान के अनुसार कार्यों को करता हुआ यह (स्वः पितरम्) = उस प्रकाशमय पिता प्रभु की ओर (प्रयन्) = जानेवाला होता है।
Essence
हम गतिशील बनें, ज्ञानी बनें। वेद के अनुसार कर्म करते हुए प्रभु-प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ें।
Subject
गौ-पृश्नि: