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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/3/2

142 Sukta
3 Mantra
6/3/2
Devata- द्यावापथिवी, ग्रावा, सोमः, सरस्वती, अग्निः Rishi- अथर्वा Chhanda- जगती Suktam- आत्मगोपन सूक्त
Mantra with Swara
पा॒तां नो॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॒भिष्ट॑ये॒ पातु॒ ग्रावा॒ पातु॒ सोमो॑ नो॒ अंह॑सः। पातु॑ नो दे॒वी सु॒भगा॒ सर॑स्वती॒ पात्व॒ग्निः शि॒वा ये अ॑स्य पा॒यवः॑ ॥

पा॒ताम् ।न॒: । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । अ॒भिष्ट॑ये । पातु॑ । ग्रावा॑ । पातु॑ । सोम॑: । न॒: । अंह॑स: । पातु॑ । न॒: । दे॒वी । सु॒ऽभगा॑ । सर॑स्वती । पातु॑ । अ॒ग्नि: । शि॒वा: । ये । अ॒स्य॒ । पा॒यव॑: ॥३.२॥

Mantra without Swara
पातां नो द्यावापृथिवी अभिष्टये पातु ग्रावा पातु सोमो नो अंहसः। पातु नो देवी सुभगा सरस्वती पात्वग्निः शिवा ये अस्य पायवः ॥

पाताम् ।न: । द्यावापृथिवी इति । अभिष्टये । पातु । ग्रावा । पातु । सोम: । न: । अंहस: । पातु । न: । देवी । सुऽभगा । सरस्वती । पातु । अग्नि: । शिवा: । ये । अस्य । पायव: ॥३.२॥

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Meaning
१. (द्यावापृथिवी) = धुलोक तथा पृथिवीलोक (न:) = हमें (अभिष्टये) = इष्ट-प्राप्ति के लिए (पाताम्) = रक्षित करें। अध्यात्म में ज्ञानसूर्य से दीस मस्तिष्क 'छौ' है तथा पाषाण-तुल्य दृढ़ शरीर 'पृथिवी' है। ये दोनों हमारे लिए इष्ट-साधक हों। (ग्रावा पातु) = उपदेष्टा आर्चाय हमारा रक्षण करे। आचार्य से दिये गये निर्देश हमारा कल्याण करें। (सोमः) = शरीर में सुरक्षित सोम (न:) = हमें अंहसः पातु-[Trouble, anxiety, care] कष्ट ब चिन्ता से रक्षित करें। २. (सुभगा) = उत्तम ज्ञानेश्वर्यवाली देवी (सरस्वती) = प्रकाशमयी, सब व्यवहारों को सिद्ध करनेवाली-विद्या की अधिष्ठात्री देवता (नः पातु) = हमें रक्षित करे। हम सरस्वती की आराधना करते हुए पाप आदि में प्रवृत्त न हों। अन्ततः वह (अग्नि:) = अग्रणी प्रभु (पातु) = हमें रक्षित करे। ये अस्य पायवः जो प्रभु के रक्षण हैं, वे( शिवा) = हमारा कल्याण करनेवाले हैं।
Essence
हमारा मस्तिष्क ज्ञान-दीप्त और शरीर दृढ़ हो। उत्तम आचार्यों के निर्देश हमें प्राप्त हों। हम शरीर में सोम का रक्षण करें, सरस्वती की अराधना करें और प्रभु की उपासना में प्रवृत्त हों।

 
Subject
द्यावापृथिवी अग्निः