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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/3/1

142 Sukta
3 Mantra
6/3/1
Devata- इन्द्रापूषणौ, अदितिः, मरुद्गणः, अपांनपात्, सिन्धुसमूहः, विष्णुः, द्यौः Rishi- अथर्वा Chhanda- पथ्याबृहती Suktam- आत्मगोपन सूक्त
Mantra with Swara
पा॒तं न॑ इन्द्रापूष॒णादि॑तिः पान्तु म॒रुतः॑। अपां॑ नपात्सिन्धवः स॒प्त पा॑तन॒ पातु॑ नो॒ विष्णु॑रु॒त द्यौः ॥

पा॒तम् । न॒: । इ॒न्द्रा॒पू॒ष॒णा॒ । अदि॑ति: । पान्तु॑ । म॒रुत॑: । अपा॑म् । न॒पा॒त् । सि॒न्ध॒व॒: । स॒प्त । पा॒त॒न॒ । पातु॑ । न॒: । विष्णु॑: । उ॒त। द्यौ: ॥३.१॥

Mantra without Swara
पातं न इन्द्रापूषणादितिः पान्तु मरुतः। अपां नपात्सिन्धवः सप्त पातन पातु नो विष्णुरुत द्यौः ॥

पातम् । न: । इन्द्रापूषणा । अदिति: । पान्तु । मरुत: । अपाम् । नपात् । सिन्धव: । सप्त । पातन । पातु । न: । विष्णु: । उत। द्यौ: ॥३.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (न:) = हमें (इन्द्रापूषणा पातम्) = इन्द्र और पूषा रक्षित करें। इन्द्र' जितेन्द्रिया का प्रतीक है और 'पूषा' का भाव है-अङ्ग-प्रत्यङ्ग का पोषण। हम जितेन्द्रिय बनकर सर्वाङ्ग सम्पुष्ट हों। (अदितिः मरुतः पान्तु) = अदिति और मरुत् हमारा रक्षण करें। 'अदिति' [अ-दिति] स्वास्थ्य की देवता है और 'मरुत्' प्राण हैं। हम प्राणसाधना करते हुए पूर्ण स्वस्थ होने का प्रयल करें। २. (अपां न पात्) = रेत:कणरूप जलों का न गिरने देनेवाला देव तथा (सप्त सिन्धवः) = 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' इन सात ऋषियों से प्रवाहित होनेवाले सात ज्ञान-जलों के प्रवाह (पातन) = हमारा रक्षण करें। वीर्य-रक्षण द्वारा ज्ञानग्नि को दीत करके हम उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्त करें। (न:) = हमें (विष्णुः) = व्यापकता का देव (उत) = और (द्यौः) = प्रकाश (पातु) = रक्षित करें। हमारा हृदय विशाल हो और मस्तिष्करूप धुलोक ज्ञानसूर्य से दीप्त बने।
Essence
हम जितेन्द्रिय बनकर सब अङ्गों की पुष्टि प्राप्त करें। हमारा हृदय विशाल हो और मस्तिष्क दीप्त।
Subject
इन्द्रापूषणा, विष्णुः उत द्यौः