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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/29/1

142 Sukta
3 Mantra
6/29/1
Devata- यमः, निर्ऋतिः Rishi- भृगु Chhanda- विराड्गायत्री Suktam- अरिष्टक्षयण सूक्त
Mantra with Swara
अ॒मून्हे॒तिः प॑त॒त्रिणी॒ न्येतु॒ यदुलू॑को॒ वद॑ति मो॒घमे॒तत्। यद्वा॑ क॒पोतः॑ प॒दम॒ग्नौ कृ॒णोति॑ ॥

अ॒मून् । हे॒ति: । प॒त॒त्रिणी॑ । नि । ए॒तु॒ । यत् । उलू॑क: । वद॑ति । मो॒घम् । ए॒तत् । यत् । वा॒ । क॒पोत॑: । प॒दम् । अ॒ग्नौ । कृ॒णोति॑ ॥२९.१॥

Mantra without Swara
अमून्हेतिः पतत्रिणी न्येतु यदुलूको वदति मोघमेतत्। यद्वा कपोतः पदमग्नौ कृणोति ॥

अमून् । हेति: । पतत्रिणी । नि । एतु । यत् । उलूक: । वदति । मोघम् । एतत् । यत् । वा । कपोत: । पदम् । अग्नौ । कृणोति ॥२९.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (पतत्रिणी) = पतन की कारणभूत (हेति:) = हनन [विनाश] करनेवाली यह लोभबृति (अमून) = हमसे दूरस्थ हमारे शत्रुओं को (नि एत) = निश्चय से प्राप्त हो। लोभवृति के शिकार हमारे शत्रु ही हों। हम इस लोभवृत्ति से बचे ही रहें। २. (यत्) = जब (उलूक:) = [उच समवाये] प्रभु से समवाय वाला-स्तवन द्वारा प्रभु से मेलवाला यह स्तोता (वदति) = प्रभु के नामों का उच्चारण करता है तब (एतत् मोषम्) = सब शत्रुओं का आक्रमण व्यर्थ होता है, (यत् वा) = अथवा जब (कपोत:)= आनन्द का पोत प्रभु (आग्नौ) = प्रगतिशील जीवन में (पदम् कृणोति) = पग रखता है, अर्थात् जब कपोत इस अग्नि को प्राप्त होता है। प्रभु की उपस्थिति में उपासक 'काम, क्रोध, लोभ' आदि से आक्रान्त नहीं होता।
Essence
हम प्रभु से मेलवाले बनकर प्रभु के नामों का उच्चारण करें, तब वे आनन्द के पोत प्रभु हमारे हृदयों में आसीन होंगे और तब लोभ आदि शत्रुओं का हमपर आक्रमण न हो सकेगा।

 
Subject
उलूक: