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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/28/2

142 Sukta
3 Mantra
6/28/2
Devata- यमः, निर्ऋतिः Rishi- भृगु Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अरिष्टक्षयण सूक्त
Mantra with Swara
परी॒मे॒ग्निम॑र्षत॒ परी॒मे गाम॑नेषत। दे॒वेष्व॑क्रत॒ श्रवः॒ क इ॒माँ आ द॑धर्षति ॥

परि॑ । इ॒मे । अ॒ग्निम् । अ॒र्ष॒त॒ । परि॑ । इ॒मे । गाम् । अ॒ने॒ष॒त॒ । दे॒वेषु॑ । अ॒क्र॒त॒ । श्रव॑: । क: । इ॒मान् । आ । द॒ध॒र्ष॒ति॒ ॥२८.२॥

Mantra without Swara
परीमेग्निमर्षत परीमे गामनेषत। देवेष्वक्रत श्रवः क इमाँ आ दधर्षति ॥

परि । इमे । अग्निम् । अर्षत । परि । इमे । गाम् । अनेषत । देवेषु । अक्रत । श्रव: । क: । इमान् । आ । दधर्षति ॥२८.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार प्रभु का अनुसरण करनेवाले (इमे) = ये व्यक्ति (अग्निं परि अर्षत) = प्रभु की ओर गतिवाले होते हैं। (इमे) = ये (गाम्) = वेदवाणी को परि अनेषत परिणीत करते हैं। वेदवाणी को अपनानेवाले होते हैं। २. इसप्रकार ये (देवेषु) = दिव्य गुणों में (श्रवः) = यश को (अक्रत) = करनेवाले होते हैं, दिव्य गुणों को धारण करके यशस्वी बनते हैं। (क:) = अब कौन (इमान्) = इन्हें (आ दधर्षति) = धर्षित कर सकता है? 'काम-क्रोध, लोभ आदि कोई भी शत्रु इन्हें आक्रान्त करनेवाला नहीं होता।
Essence
हम प्रभु की ओर चलें, वेदवाणी को परिणीत करें, दिव्य गुणों से यशस्वी बनें और काम आदि से अजय्य हों।


 
Subject
गो परिणय