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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/26/2

142 Sukta
3 Mantra
6/26/2
Devata- पाप्मा Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- पाप्मनाशन सूक्त
Mantra with Swara
यो नः॑ पाप्म॒न्न जहा॑सि॒ तमु॑ त्वा जहिमो व॒यम्। प॒थामनु॑ व्या॒वर्त॑ने॒ऽन्यं पा॒प्मानु॑ पद्यताम् ॥

य: । न॒: । पा॒प्म॒न् । न । जहा॑सि । तम् ।ऊं॒ इति॑ । त्वा॒ । ज॒हि॒म॒: । व॒यम्। प॒थाम् । अनु॑ । वि॒ऽआ॒वर्त॑ने । अ॒न्यम् । पा॒प्मा । अनु॑ । प॒द्य॒ता॒म् ॥२६.२॥

Mantra without Swara
यो नः पाप्मन्न जहासि तमु त्वा जहिमो वयम्। पथामनु व्यावर्तनेऽन्यं पाप्मानु पद्यताम् ॥

य: । न: । पाप्मन् । न । जहासि । तम् ।ऊं इति । त्वा । जहिम: । वयम्। पथाम् । अनु । विऽआवर्तने । अन्यम् । पाप्मा । अनु । पद्यताम् ॥२६.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (पाप्मन्) = पापभाव! (य:) = जो तू (न:) = हमें (न जहासि) = नहीं छोड़ता है, (तं त्वा) = उस तुझे (वयम्) = हम ही (उ) = निश्चय से (जहिमः) = छोड़ देते हैं। पाप को छोड़ने का दृढ़ निश्चय ही सर्वोत्तम व्रत है। २. (पथाम् अनु व्यावर्तने) = [पथ गतौ] गतिशील इन्द्रियों को अनुकूल कर्मों में लौटा लेने पर-उचित कर्मों में लगाने के द्वारा-इन्द्रियों को निरुद्ध कर लेने पर (पाप्मा) = यह पापभाव (अन्यं अनुपद्यताम्) = इन्द्रिय-निरोध न करनेवाले दूसरे ही किसी व्यक्ति को प्राप्त हो।
Essence
पाप हमें नहीं छोड़ जाएगा, इसे तो हमें ही छोड़ना होगा। इन्द्रियों को अनुकूल कार्यों में व्याप्त रखना ही पाप से बचने का उपाय है।
Subject
पाप के छोड़ने का दृढ़ निश्चय