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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/24/1

142 Sukta
3 Mantra
6/24/1
Devata- आपः Rishi- शन्ताति Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अपांभैषज्य सूक्त
Mantra with Swara
हि॒मव॑तः॒ प्र स्र॑वन्ति॒ सिन्धौ॑ समह सङ्ग॒मः। आपो॑ ह॒ मह्यं॒ तद्दे॒वीर्दद॑न्हृ॒द्द्योत॑भेष॒जम् ॥

हि॒मऽव॑त: । प्र । स्र॒व॒न्ति॒ । सिन्धौ॑ । स॒म॒ह॒ । स॒म्ऽग॒म: । आप॑: । ह॒ । मह्य॑म्। तत्। दे॒वी: । दद॑न् । हृ॒द्द्यो॒त॒ऽभे॒ष॒जम् ॥२४.१॥

Mantra without Swara
हिमवतः प्र स्रवन्ति सिन्धौ समह सङ्गमः। आपो ह मह्यं तद्देवीर्ददन्हृद्द्योतभेषजम् ॥

हिमऽवत: । प्र । स्रवन्ति । सिन्धौ । समह । सम्ऽगम: । आप: । ह । मह्यम्। तत्। देवी: । ददन् । हृद्द्योतऽभेषजम् ॥२४.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (आप:) = जल (हिमवतः प्रस्त्रवन्ति) = हिमाच्छादित पर्वतों से बहते हैं और (अह) = निश्चय से (सिन्धौ) = समुद्र में (सङ्गमः) = इनका एकत्र मेल होता है। ये विविध पर्वतों से बहनेवाले जल जब समुद्र में एकत्र होते हैं तब उनमें कितनी ही औषधों के गुण आ जाते हैं। २. अत: (तत्) = ये (देवी: आपः) = दिव्य गुणयुक्त जल (ह) = निश्चय से (मह्यम्) = मेरे लिए (हृद्योतभेषजम् ददन्)-हृदय के जलन की औषध दें। इन जलों के प्रयोग से हृदय की जलन शान्त हो।
Essence
हिमाच्छादित पर्वतों से बहकर समुद्र में एकत्र होनेवाले जल हदय की जलन को शान्त करने के सर्वोत्तम औषध हैं।
Subject
समुद्रजल हृदद्योतभेषजम्