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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/23/2

142 Sukta
3 Mantra
6/23/2
Devata- आपः Rishi- शन्ताति Chhanda- त्रिपदा गायत्री Suktam- अपांभैषज्य सूक्त
Mantra with Swara
ओता॒ आपः॑ कर्म॒ण्या॑ मु॒ञ्चन्त्वि॒तः प्रणी॑तये। स॒द्यः कृ॑ण्व॒न्त्वेत॑वे ॥

आऽउ॑ता: । आप॑: । क॒र्म॒ण्या᳡: । मु॒ञ्चन्तु॑ । इ॒त: । प्रऽनी॑तये । स॒द्य: । कृ॒ण्व॒न्तु॒ । एत॑वे ॥२३.२॥

Mantra without Swara
ओता आपः कर्मण्या मुञ्चन्त्वितः प्रणीतये। सद्यः कृण्वन्त्वेतवे ॥

आऽउता: । आप: । कर्मण्या: । मुञ्चन्तु । इत: । प्रऽनीतये । सद्य: । कृण्वन्तु । एतवे ॥२३.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. शरीरस्थ रेतः कण 'आप:' हैं। ये (आपः) = रेत:कण (कर्मण्याः) = हमें सब कर्मों में कुशल बनाते हैं जबकि ये (ओता:) = मेरे शरीर में व्याप्त हों। ये मुझे (प्रणीतये) = प्रकृष्ट मार्ग पर चलने के लिए (इतः मुञ्चन्तु) = इधर से मुक्त करें। मेरे शरीर में किसी प्रकार का रोग न हो। नीरोगता में ही आगे बढ़ना सम्भव है। २. ये रेत:कण (सद्य:) = शीघ्र ही (एतवे कण्वन्तु) = मुझे गति के लिए करें। इनके रक्षण के द्वारा मैं शक्तिशाली बनूँ और क्रियाशील होऊँ।
Essence
शरीर में रेत:कणों के रूप में व्याप्त ये जल मुझे नीरोग बनाकर उन्नति-पथ पर ले-चलें और मुझे क्रियामय जीवनवाला बनाएँ।
Subject
कर्मण्या आपः