Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/23/1

142 Sukta
3 Mantra
6/23/1
Devata- आपः Rishi- शन्ताति Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- अपांभैषज्य सूक्त
Mantra with Swara
स॒स्रुषी॒स्तद॒पसो॒ दिवा॒ नक्तं॑ च स॒स्रुषीः॑। वरे॑ण्यक्रतुर॒हम॒पो दे॒वीरुप॑ ह्वये ॥

स॒स्रुषी॑: । तत् । अ॒पस॑: । दिवा॑ । नक्त॑म्। च॒ । स॒स्रुषी॑: । वरे॑ण्यऽक्रतु । अ॒हम् । अ॒प: । दे॒वी: । उप॑ । ह्व॒ये॒ ॥२३.१॥

Mantra without Swara
सस्रुषीस्तदपसो दिवा नक्तं च सस्रुषीः। वरेण्यक्रतुरहमपो देवीरुप ह्वये ॥

सस्रुषी: । तत् । अपस: । दिवा । नक्तम्। च । सस्रुषी: । वरेण्यऽक्रतु । अहम् । अप: । देवी: । उप । ह्वये ॥२३.१॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. (वरेण्यक्रतुः अहम्) = प्रशंसित श्रेष्ठ कर्म व प्रज्ञानवाला मैं (तत् सस्नुषी:) = उन प्रवाहयुक्त जलधाराओं को (च) = और (दिवा नक्तम्) = दिन-रात (सस्नुषी: अपस:) = धाराओं में बहनेवाले जलों को (उपह्वये) = पुकारता हूँ। जल बह रहे हैं और बह ही रहे हैं। मैं भी निरन्तर कार्यक्रम में बहनेवाला-शान्तभाव से कर्त्तव्यकर्मों को करनेवाला बनूं। २. मैं (देवी: अप:) = इन दिव्य गुणयुक्त जलों को पुकारता हूँ। इनके प्रयोग से मैं रोगों को जीतनेवाला बनूं। नौरोग बनकर जलों की भाँति शान्तभाव से कर्तव्यधारा में बहनेवाला बनूं।
Essence
हम जलों का स्मरण करें। जलों की भाँति शान्तभाव से कर्तव्यधारा में बहें । यही 'वरेण्यक्रतु' बनने का मार्ग है।
Subject
वरेण्य क्रतु द्वारा अपों का आह्वान