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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/17/2

142 Sukta
4 Mantra
6/17/2
Devata- गर्भदृंहणम्, पृथिवी Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- गर्भदृंहण सूक्त
Mantra with Swara
यथे॒यं पृ॑थि॒वी म॒ही दा॒धारे॒मान्वन॒स्पती॑न्। ए॒वा ते॑ ध्रियतां॒ गर्भो॒ अनु॒ सूतुं॒ सवि॑तवे ॥

यथा॑ । इ॒यम् । पृ॒थि॒वी । म॒ही । दा॒धार॑ । इ॒मान् । वन॒स्पती॑न् । ए॒व । ते॒ । ध्रि॒य॒ता॒म् । गर्भ॑: । अनु॑ । सूतु॑म् । सवि॑तवे ॥१७.२॥

Mantra without Swara
यथेयं पृथिवी मही दाधारेमान्वनस्पतीन्। एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतुं सवितवे ॥

यथा । इयम् । पृथिवी । मही । दाधार । इमान् । वनस्पतीन् । एव । ते । ध्रियताम् । गर्भ: । अनु । सूतुम् । सवितवे ॥१७.२॥

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Meaning
१. (यथा) = जैसे (इयम्) = यह (मही पृथिवी) = विशाल पृथिवी (भूतानाम्) = सब प्राणियों के (गर्भम्) = मूलभूत बीज को (आदधे) = धारण करती है (एव) = इसीप्रकार हे प्रियतमे! (ते) = तेरा (गर्भ:) = गर्भ घियताम् धारण किया जाए। यह गर्भ (अनु सूतं सवितवे) = पुत्र को अनुकूल समय पर जन्म देने के लिए हो। २.( यथा इयं मही पृथिबी) = जिस प्रकार यह विशाल पृथिवी इमान् वनस्पतीन् दाधार-इन वनस्पतियों को धारण करती है, (एव) = इसीप्रकार ते (गर्भ ध्रियताम्) = तेरा यह गर्भ धारण किया जाए और (अनु सूतुं सवितवे) = पुत्र को अनुकूल समय पर जन्म देनेवाला हो। ३. (यथा इयं मही पृथिवी) = जैसे यह विशाल पृथिवी (पर्वतान् गिरीन्) = इन बड़े पर्वतों और छोटी पहाड़ियों को दाधार-धारण करती है। इसीप्रकार तेरा गर्भ धारण किया जाए और वह अनुकूल समय पर सन्तान को जन्म देनेवाला हो। ४. (यथा इयं मही पृथिवी) = जैसे यह विशाल पृथिवी (विष्ठितं जगत् दाधार) = नाना प्रकार से विभक्त-व्यवस्थित चराचर जगत् को धारण करती है उसी प्रकार तेरा यह गर्भ धारण किया जाए और वह अनुकूल समय पर सन्तान को जन्म देनेवाला हो।
Essence
माता पृथिवी के समान है। पृथिवी की भाँति ही सब भूतों के गर्भ को धारण करती है और अनुकूल समय पर सन्तान को जन्म देती है।
Subject
अनुसूतं सवितवे
Special
अथर्वा ही अगले सूक्त का ऋषि है। इसमें यह 'ईर्ष्या' को एक महान् दोष के रूप में देखता है। माता में ईर्ष्या की वृत्ति गर्भस्थ बालक की मृत्यु का भी कारण बन जाती है, अत: ईर्ष्या के त्याग का उपदेश करते हैं