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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/16/3

142 Sukta
4 Mantra
6/16/3
Devata- चन्द्रमाः Rishi- शौनक् Chhanda- बृहतीगर्भा ककुम्मत्यनुष्टुप् Suktam- अक्षिरोगभेषज सूक्त
Mantra with Swara
तौवि॑लि॒केऽवे॑ल॒यावा॒यमै॑ल॒ब ऐ॑लयीत्। ब॒भ्रुश्च॑ ब॒भ्रुक॑र्ण॒श्चापे॑हि॒ निरा॑ल ॥

तौवि॑लिके । अव॑ । ई॒ल॒य॒ । अव॑ । अ॒यम् । ऐ॒ल॒ब: । ऐ॒ल॒यी॒त् । ब॒भ्रु: । च॒ । ब॒भ्रुऽक॑र्ण: । च॒ । अप॑ । इ॒हि॒ । नि: । आ॒ल॒ ॥१६.३॥

Mantra without Swara
तौविलिकेऽवेलयावायमैलब ऐलयीत्। बभ्रुश्च बभ्रुकर्णश्चापेहि निराल ॥

तौविलिके । अव । ईलय । अव । अयम् । ऐलब: । ऐलयीत् । बभ्रु: । च । बभ्रुऽकर्ण: । च । अप । इहि । नि: । आल ॥१६.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (तौविलिके) = [तु वृद्धी+इल गतौ] सदा वृद्ध प्रभु से गति करनेवाली प्रकृते। तू (अव ईलय) = अपने को हमसे दूर प्रेरित कर-हमें बाँधनेवाली न हो। (अयम्) = यह (ऐलब:) = समस्त प्रकृति का सञ्चालक प्रभु [इला, वा गतौ] अब (ऐलयीत्) = तुझे हमसे दूर करे। प्रभु के अनुग्रह से हम तुझमें फँसे नहीं। २. प्रभु जीव से कहते हैं कि हे (निराल) = [अल वारणे] कर्तव्य के निवारण से निर्गत-निश्चय से कर्तव्य का पालन करनेवाले जीव! (बभ्रू: च) = सब शक्तियों का भरण करनेवाला, (बभ्रुकर्ण: च) = और धारक शक्तियों को सर्वत्र विकीर्ण करनेवाला तू-सबका धारण करनेवाला तू (अप इहि) = प्रकृति-बन्धन से दूर हो। कर्तव्य का पालन करता हुआ, शक्तियों को धारण करनेवाला तथा सबको धारण करनेवाला बनता हुआ तू प्रकृति-बन्धन से ऊपर उठेगा।
Essence
हम प्रकृति बन्धन से ऊपर उठे। इसी उद्देश्य से [क] कर्त्तव्य कर्मों में लगे रहें, [ख] शक्तियों का धारण करें, [ग] धारक शक्तियों को सर्वत्र फैलाएँ-सबका धारण करनेवाले बनें।
Subject
बभुश्च बभुकर्णश्च