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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/15/3

142 Sukta
3 Mantra
6/15/3
Devata- वनस्पतिः Rishi- उद्दालक Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुनिवारण सूक्त
Mantra with Swara
यथा॒ सोम॒ ओष॑धीनामुत्त॒मो ह॒विषां॑ कृ॒तः। त॒लाशा॑ वृ॒क्षाना॑मिवा॒हं भू॑यासमुत्त॒मः ॥

यथा॑ । सोम॑: । ओष॑धीनाम् । उ॒त्ऽत॒म: । ह॒विषा॑म् । कृ॒त: । त॒लाशा॑ । वृ॒क्षाणा॑म्ऽइव । अ॒हम् । भू॒या॒स॒म् । उ॒त्ऽत॒म: ॥१५.३॥

Mantra without Swara
यथा सोम ओषधीनामुत्तमो हविषां कृतः। तलाशा वृक्षानामिवाहं भूयासमुत्तमः ॥

यथा । सोम: । ओषधीनाम् । उत्ऽतम: । हविषाम् । कृत: । तलाशा । वृक्षाणाम्ऽइव । अहम् । भूयासम् । उत्ऽतम: ॥१५.३॥

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Meaning
१. (यथा) = जैसे (ओषधीनाम) = ओषधियों में (सोमः उत्तमः) = सोम उत्तम है और जैसे यह सोम (हविषाम्) = हव्य पदार्थों में (उत्तमः कृत:) = किया गया है, (इव) = जैसे (वृक्षाणां) = तलाशा वृक्षों में तलाश [पलाश-ढाक] वृक्ष उत्तम है [तलं अश्नुते], इसीप्रकार (अहम्) = मैं (उत्तम: भूयासम्) = अपने कुल में उत्तम बनें।
Essence
मैं अपने कुल में ऐसे उत्तम बनूं जैसेकि ओषधियों में सोम और वृक्षों में पलाश।
Subject
सोमः, तलाश:
Special
ओषधिरस का पान करनेवाला [ब्रह्मौषधि का उपासक] अपने जीवन को सुखी बनानेवाला 'शौनक' कहलाता है [शुनं सुखम्]। यही अगले सुक्त का ऋषि है। -