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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/141/3

142 Sukta
3 Mantra
6/141/3
Devata- अश्विनौ Rishi- विश्वामित्र Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- गोकर्णलक्ष्यकरण सूक्त
Mantra with Swara
यथा॑ च॒क्रुर्दे॑वासु॒रा यथा॑ मनु॒ष्या उ॒त। ए॒वा स॑हस्रपो॒षाय॑ कृणु॒तं लक्ष्मा॑श्विना ॥

यथा॑ । च॒क्रु॒: । दे॒व॒ऽअ॒सु॒रा: । यथा॑ । म॒नु॒ष्या᳡: । उ॒त । ए॒व । स॒ह॒स्र॒ऽपो॒षाय॑ । कृ॒णु॒तम् । लक्ष्म॑ । अ॒श्वि॒ना॒ ॥१४१.३॥

Mantra without Swara
यथा चक्रुर्देवासुरा यथा मनुष्या उत। एवा सहस्रपोषाय कृणुतं लक्ष्माश्विना ॥

यथा । चक्रु: । देवऽअसुरा: । यथा । मनुष्या: । उत । एव । सहस्रऽपोषाय । कृणुतम् । लक्ष्म । अश्विना ॥१४१.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. सामान्य मनुष्य यदि मनुष्य' शब्द वाच्य हैं, तो उत्तम मनुष्य 'देव' तथा अधम 'असुर' कहलाते हैं। ये क्रमश: राजस, सात्त्विक व तामस होते हुए भी गौओं को रखते हैं और अपने गोवत्सों के कानों पर स्त्री-पुंसात्मक चिह्नों को करते हैं। (यथा) = जैसे (देवासुरा:) = देव व असुर (चक्रुः) = करते हैं, (उत्) = और (यथा) = जैसे (मनुष्या:) = सामान्य मनुष्य भी करते हैं, (एव) = उसी प्रकार (अश्विना) = गृहस्थ दम्पती (लक्ष्म कृणुतम्) = गोवत्सों के कर्णों पर चिहों को करें, जिससे (सहस्त्रपोषाय) = सहस्रों की संख्या में उनका पोषण हो।
Essence
हम 'सात्त्विक, राजस् व तामस्' इनमें से किसी भी श्रेणी में हों, गौओं को रक्खें। उनके वत्सों के कर्णों पर लक्ष्म [चिह्न] बनाएँ, जिससे उनका सहस्रशः पोषण होता रहे।
Subject
देव-असुर-मनुष्य