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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/141/2

142 Sukta
3 Mantra
6/141/2
Devata- अश्विनौ Rishi- विश्वामित्र Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- गोकर्णलक्ष्यकरण सूक्त
Mantra with Swara
लोहि॑तेन॒ स्वधि॑तिना मिथु॒नं कर्ण॑योः कृधि। अक॑र्तामश्विना॒ लक्ष्म॒ तद॑स्तु प्र॒जया॑ ब॒हु ॥

लोहि॑तेन । स्वऽधि॑तिना । मि॒थु॒नम् । कर्ण॑यो: । कृ॒धि॒ । अक॑र्ताम्‌ । अ॒श्विना॑ । लक्ष्म॑ । तत् । अ॒स्तु॒ । प्र॒ऽजया॑ । ब॒हु ॥१४१.२॥

Mantra without Swara
लोहितेन स्वधितिना मिथुनं कर्णयोः कृधि। अकर्तामश्विना लक्ष्म तदस्तु प्रजया बहु ॥

लोहितेन । स्वऽधितिना । मिथुनम् । कर्णयो: । कृधि । अकर्ताम्‌ । अश्विना । लक्ष्म । तत् । अस्तु । प्रऽजया । बहु ॥१४१.२॥

Meaning
१. हे गोपाल! (लोहितेन) = लोहितवर्ण ताम्रविकार (स्वधितिना) = शस्त्र से (कर्णयो:) = वत्स सम्बन्धी कानों में (मिथुनं कृधि) = स्त्री-पुंसात्मक चिह्न कर। (अश्विनी) = गृहस्थ दम्पती [माता पिता] लक्ष्म (अकर्ताम्) = इस चिह्न को करें। (तत्) = वह चिह्न (प्रजया बहु अस्तु) = पुत्र-पौत्रादि प्रजा से समृद्ध हो, अर्थात् कानों में किया गया वह चिह्न हमारे गोधन की समृद्धि का कारण बने।
Essence
अपनी गौओं के बछड़ों के कानों में गृहस्थ दम्पती गोपालों द्वारा ताम्रशस्त्र से चिह कराएँ [कर्णवेध कराएँ]। यह चिह्न गोसन्तति की वृद्धि के लिए आवश्यक है।
Subject
गोवत्सों का कर्णवेध

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