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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/14/2

142 Sukta
3 Mantra
6/14/2
Devata- बलासः Rishi- बभ्रुपिङ्गल Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- बलासनाशन सूक्त
Mantra with Swara
निर्ब॒लासं॑ बला॒सिनः॑ क्षि॒णोमि॑ मुष्क॒रं य॑था। छि॒नद्म्य॑स्य॒ बन्ध॑नं॒ मूल॑मुर्वा॒र्वा इ॑व ॥

नि: । ब॒लास॑म् । ब॒ला॒सिन॑:। क्षि॒णोमि॑ । मु॒ष्क॒रम् । य॒था॒ । छि॒नद्मि॑ । अ॒स्य॒ । बन्ध॑नम् । मूल॑म् । उ॒र्वा॒र्वा:ऽइ॑व ॥१४.२॥

Mantra without Swara
निर्बलासं बलासिनः क्षिणोमि मुष्करं यथा। छिनद्म्यस्य बन्धनं मूलमुर्वार्वा इव ॥

नि: । बलासम् । बलासिन:। क्षिणोमि । मुष्करम् । यथा । छिनद्मि । अस्य । बन्धनम् । मूलम् । उर्वार्वा:ऽइव ॥१४.२॥

Meaning
१. (बलासिन:) = क्षयरोगी से (बलासम्) = क्षयरोग को इसप्रकार (नि:क्षिणोमि) = दूर करता हूँ (यथा) = जैसेकि (मुष्करम्) = चोरी करनेवाले को दूर किया जाता है। २. (अस्य) = इसके (बन्धनं छिनदि) = बन्धन को ऐसे काट डालता हूँ (इव) = जैसेकि (उर्वार्ताः मूलम्) = ककड़ी की जड़ को काट देते हैं।
Essence
क्षय-रोग चोर के समान हमारी शक्ति को चुरा लेता है। इसका तो नाश करना ही ठीक है। ककड़ी की जड़ की भाँति इसे काट डालना आवश्यक है।

 
Subject
मुष्करं यथा, उर्वावा मूलम् इव

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