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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/136/2

142 Sukta
3 Mantra
6/136/2
Devata- नितत्नीवनस्पतिः Rishi- वीतहव्य Chhanda- एकावसाना द्विपदा साम्नी बृहती Suktam- केशदृंहण सूक्त
Mantra with Swara
दृंह॑ प्र॒त्नान् ज॒नयाजा॑तान् जा॒तानु॒ वर्षी॑यसस्कृधि ॥

दृंह॑ । प्र॒त्नान् । ज॒नय॑ । अजा॑तान् । जा॒तान् । ऊं॒ इति॑ । वर्षी॑यस: । कृ॒धि॒ ॥१३६.२॥

Mantra without Swara
दृंह प्रत्नान् जनयाजातान् जातानु वर्षीयसस्कृधि ॥

दृंह । प्रत्नान् । जनय । अजातान् । जातान् । ऊं इति । वर्षीयस: । कृधि ॥१३६.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (ओषधे) = नितत्नी नामक ओषधे! तू (देवी) = रोगों को जीतने की कामनावाली है, (देव्यां पृथिव्याम् अधिजाता असि) = तू दिव्य गुणों से युक्त इस पृथिवी में उत्पन्न हुई है। हे नितत्नि-नितन्वाने-न्यक प्रसरणशीले-नीचे की ओर फैलनेवाली ओषधे! तम् त्वा-उस तुझे केशेभ्य: दहणाय-केशों के दृढ़ीकरण के लिए खनामसि-खोदकर संग्रहीत करते हैं। २. हे ओषधे! तू प्रत्नान्-पुरातन केशों को दह-दृढ़ कर, अजातान् जनय-अनुत्पन केशों को उत्पन्न कर और जातान् उ-पैदा हुए-हुए को भी वर्षीयसः कृधि-प्रवृद्धतम व आयततम कर-दीर्घ बना।
Essence
नितत्नी नामक ओषधि के द्वारा केशों से सम्बद्ध विकारों को दूर किया जा सकता है। यह पुराने बालों को दृढ़ करती है, अजातों को उत्पन्न करती है तथा उत्पन्न बालों को लम्बा करने का साधन बनती है। इसी से इसका नाम नितली हुआ है।
Subject
नितत्नि