Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/135/3

142 Sukta
3 Mantra
6/135/3
Devata- वज्रः Rishi- शुक्र Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- बलप्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
यद्गिरा॑मि॒ सं गिरा॑मि समु॒द्र इ॑व संगि॒रः। प्रा॒णान॒मुष्य॑ सं॒गीर्य॒ सं गि॑रामो अ॒मुं व॒यम् ॥

यत् । गिरा॑मि । सम् । गि॒रा॒मि॒ । स॒मु॒द्र:ऽइ॑व । स॒म्ऽगि॒र: । प्रा॒णान् । अ॒मुष्य॑ । स॒म्ऽगीर्य॑ । सम् । गि॒रा॒म॒: । अ॒मुम् । व॒यम् ॥१३५.३॥

Mantra without Swara
यद्गिरामि सं गिरामि समुद्र इव संगिरः। प्राणानमुष्य संगीर्य सं गिरामो अमुं वयम् ॥

यत् । गिरामि । सम् । गिरामि । समुद्र:ऽइव । सम्ऽगिर: । प्राणान् । अमुष्य । सम्ऽगीर्य । सम् । गिराम: । अमुम् । वयम् ॥१३५.३॥

Meaning
१. (यत् पिबामि) = मैं जो जल पीता हूँ तो (संपिबामि) = शत्रु का निग्रह करके उसके रस को ही पी जाता है, उसी प्रकार (इव) = जैसेकि (समुद्रः) = समुद्र नदीमुख से सारे जल को लेकर (संपिबः) = सम्यक् पी जाता है। (वयम्) = हम भी (अमुष्य) = उस शत्रु के (प्राणान् संपाय) = प्राणापान आदि व्यापार को पीकर (अमुम्) = उस शत्रु को ही (संपिबाम:) = पी जाते हैं। २. (यत् गिरामि) = जो कुछ मैं खाता हूँ तो (संगिरामि) = शत्रु को ही निगल जाता हूँ। (इव) = जैसेकि (समुद्रः) = समुद्र (संगिरः) = नदी-जल को निगीर्ण कर लेता है। (वयम्) = हम भी (अमुष्य) = उस शत्रु के (प्रणान् संगीर्य) = प्राणों को निगलकर (अमुं संगिरामः) = उस शत्र को ही निगल जाते हैं।
Essence
हम खाते-पीते इस दृष्टिकोण को न भूलें कि इस खान-पान से शक्ति का सम्पादन करके शत्रुओं को ही खा-पी जाना है, स्वाद का दृष्टिकोण तो हमें ही शत्रुओं का शिकार बना देगा।
Subject
सं-पान-संगरण
Special
स्वस्थ शरीर के लिए वीतहव्य-पवित्र पदार्थों को खानेवाला ही होना चाहिए। यह 'वीतहव्य' शरीर को स्वस्थ बनाता हुआ अपने केशों को भी सुदृढ बनाता है। अगले दो सूक्तों का ऋषि यही है।

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.