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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/13/2

142 Sukta
3 Mantra
6/13/2
Devata- मृत्युः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- मृत्युञ्जय सूक्त
Mantra with Swara
नम॑स्ते अधिवा॒काय॑ परावा॒काय॑ ते॒ नमः॑। सु॑म॒त्यै मृ॑त्यो ते॒ नमो॑ दुर्म॒त्यै त॑ इ॒दं नमः॑ ॥

नम॑: । ते॒ । अ॒धि॒ऽवा॒काय॑ । प॒रा॒ऽवा॒काय॑ । ते॒ । नम॑: । सु॒ऽम॒त्यै । मृ॒त्यो॒ इति॑ । ते॒ । नम॑: । दु॒:ऽम॒त्यै । ते॒ । इ॒दम्। नम॑: ॥१३.२॥

Mantra without Swara
नमस्ते अधिवाकाय परावाकाय ते नमः। सुमत्यै मृत्यो ते नमो दुर्मत्यै त इदं नमः ॥

नम: । ते । अधिऽवाकाय । पराऽवाकाय । ते । नम: । सुऽमत्यै । मृत्यो इति । ते । नम: । दु:ऽमत्यै । ते । इदम्। नम: ॥१३.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (मृत्यो) = मृत्यो! (ते) = तेरे कारणभूत (अधिवाकाय) = अनुकूल वचन के लिए हम (नमः) = नमन करते हैं। अनुकूल वचनों का अतिरेक होने से अविवेक उत्पन्न होकर मृत्यु होती है, अत: इनसे बचना ही ठीक है, (ते) = तेरे कारणभूत (परावाकाय) = प्रतिकूल वचनों के लिए (नमः) = नमस्कार हो। प्रतिकूल वचनों से निराशा होकर मृत्यु होती है। २. हे मृत्यो। (ते) = तेरी कारणभूत (सुमत्यै) = सुमति के लिए भी नमः नमस्कार हो। केवल सुमति हमें शरीर के प्रति उदासीन करके मृत्यु की ओर ले-जाती है और (ते) = तेरी कारणभूत (दुर्मत्यै) = दुर्मति के लिए (इदं नम:) = यह नमस्कार हो। दुर्मति तो सदा मृत्यु का कारण बनती ही है।
Essence
हर समय अनुकूल वचनों को ही सुननेवाला अविवेकवश मृत्यु का शिकार हो जाता है। प्रतिक्षण प्रतिकूल वचनों का श्रवण हमें निराश करके मार डालता है। सुमति में हम बौद्धिक कार्यों की ओर ही झुककर शरीर का ध्यान नहीं करते और दुर्मति तो सतत विनाश का कारण है ही।
Subject
अधिवाक, परावाक, सुमति, दुर्मति