Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 6/123/5

142 Sukta
5 Mantra
6/123/5
Devata- विश्वे देवाः Rishi- भृगु Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- सौमनस्य सूक्त
Mantra with Swara
नाके॑ राज॒न्प्रति॑ तिष्ठ॒ तत्रै॒तत्प्रति॑ तिष्ठतु। वि॒द्धि पू॒र्तस्य॑ नो राज॒न्त्स दे॑व सु॒मना॑ भव ॥

नाके॑ । रा॒ज॒न् । प्रति॑ । ति॒ष्ठ॒ । तत्र॑ । ए॒तत् । प्रति॑ । ति॒ष्ठ॒तु॒ । वि॒ध्दि । पू॒र्तस्य॑ । न॒: । रा॒ज॒न् । स: । दे॒व॒ । सु॒ऽमना॑: । भ॒व॒ ॥१२३.५॥

Mantra without Swara
नाके राजन्प्रति तिष्ठ तत्रैतत्प्रति तिष्ठतु। विद्धि पूर्तस्य नो राजन्त्स देव सुमना भव ॥

नाके । राजन् । प्रति । तिष्ठ । तत्र । एतत् । प्रति । तिष्ठतु । विध्दि । पूर्तस्य । न: । राजन् । स: । देव । सुऽमना: । भव ॥१२३.५॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१.हे (राजन) = यज्ञादि उत्तम कर्मों से दीस जीवनवाले साधक! (नाके प्रतितिष्ठ) = तू सुखमय लोक में प्रतिष्ठित हो। (तत्र) = वहाँ-सुखमय लोक में (एतत्) = तेरा यह यज्ञरूप श्रेष्ठ कर्म भी (प्रतितिष्ठतु)= प्रतिष्ठित हो। २. प्रभु जीव से कहते हैं कि हे (राजन्) = दीप्त जीवनवाले साधक! (नः पूर्तस्य विद्धि) = हमसे वेद द्वारा उपदिष्ट प्रजा के पालन व पूरणात्मक कर्मों को तू जान-तू पूर्तकर्मों को करनेवाला बन । हे (देव) = दिव्य गुणयुक्त प्रकाशमय जीवनवाले साधक! (सः) = वह तू (सुमना भव) = प्रशस्त मनवाला हो।
Essence
यज्ञादि उत्तम कर्मों से सुखमय जीवनवाले बनकर हम इन यज्ञादि कर्मों में और अधिक प्रवृत्त हों। प्रभु से उपदिष्ट इष्ट व पूर्त कर्मों को करनेवाले बनें। सदा प्रसन्न व प्रशस्त मनवाले बनें।
Subject
नाके
Special
इन यज्ञादि कर्मों में स्थिरता से चलनेवाला 'अथर्वा' अगले तीन सूक्तों का ऋषि -