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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/122/1

142 Sukta
5 Mantra
6/122/1
Devata- विश्वकर्मा Rishi- भृगु Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- तृतीयनाक सूक्त
Mantra with Swara
ए॒तं भा॒गं परि॑ ददामि वि॒द्वान्विश्व॑कर्मन्प्रथम॒जा ऋ॒तस्य॑। अ॒स्माभि॑र्द॒त्तं ज॒रसः॑ प॒रस्ता॒दच्छि॑न्नं॒ तन्तु॒मनु॒ सं त॑रेम ॥

ए॒तम् । भा॒गम् । परि॑ । द॒दा॒मि॒ । वि॒द्वान् । विश्व॑ऽकर्मन् । प्र॒थ॒म॒ऽजा: । ऋ॒तस्य॑ । अ॒स्माभि॑: । द॒त्तम् । ज॒रस॑: । प॒रस्ता॑त् । अच्छि॑न्नम् । तन्तु॑म् । अनु॑ । सम् । त॒रे॒म॒ ॥१२२.१॥

Mantra without Swara
एतं भागं परि ददामि विद्वान्विश्वकर्मन्प्रथमजा ऋतस्य। अस्माभिर्दत्तं जरसः परस्तादच्छिन्नं तन्तुमनु सं तरेम ॥

एतम् । भागम् । परि । ददामि । विद्वान् । विश्वऽकर्मन् । प्रथमऽजा: । ऋतस्य । अस्माभि: । दत्तम् । जरस: । परस्तात् । अच्छिन्नम् । तन्तुम् । अनु । सम् । तरेम ॥१२२.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (विश्वकर्मन्) = ब्रह्माण्ड के निर्माता प्रभो! आप ही (प्रातस्य प्रथमजा:) = सत्य वेदवाणी का सृष्टि के आरम्भ में प्रादुर्भाव करनेवाले हैं। विद्वान् इस बात को जानता हुआ मैं (एतं भार्ग परिददामि) = इस अपने अर्जित धन के अंश को हविरूप से वायु आदि देवों के लिए देता हूँ। ये यज्ञ वेद के 'जरामर्य सत्र' हैं। इनसे तो जीवन में कभी छुटकारा होता ही नहीं। २. इसप्रकार (अस्माभिः दत्तम्) = हमारे द्वारा तो यह भाग दिया ही गया है और हमने देवऋण से अनृण होने का प्रयत्न किया है। अब (जरसः परस्तात्) = [देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तासिरस्तत्र न मुह्यति] जरा के पश्चात्-दीर्घजीवन प्राप्त करके देहान्तर प्राप्त होने पर भी (अच्छिन्नं तुन्तम् अनु) = अविच्छिन्न पुत्र-पौत्रादिलक्षण सन्तान-तन्तु में अनुप्रविष्ट होकर [तायते कुलम् अनेनेति तन्तुः] (सन्तरेम) = यज्ञों द्वारा देवऋण को तैरनेवाले बनें, अर्थात् हमारे वंश में यह यज्ञ की परिपार्टी बनी ही रहे।
Essence
भावार्थ-हम आजीवन अग्निहोत्र को अपनाते हैं। मृत्यु होने पर भी सन्तानों में अनुप्रविष्ट होकर इस देवऋण से अनृण होने का प्रयत्न करते हैं, अर्थात् हमारे वंश में यह यज्ञ अविच्छन्नरूप में चलता ही है।
Subject
नियम से अग्निहोत्र करना