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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/113/3

142 Sukta
3 Mantra
6/113/3
Devata- पूषा Rishi- अथर्वा Chhanda- पङ्क्तिः Suktam- पापनाशन सूक्त
Mantra with Swara
द्वा॑दश॒धा निहि॑तं त्रि॒तस्याप॑मृष्टं मनुष्यैन॒सानि॑। ततो॒ यदि॑ त्वा॒ ग्राहि॑रान॒शे तां ते॑ दे॒वा ब्रह्म॑णा नाशयन्तु ॥

द्वा॒द॒श॒ऽधा । निऽहि॑तम् । त्रि॒तस्य॑ । अप॑ऽमृष्टम् । म॒नु॒ष्य॒ऽए॒न॒सानि॑ । तत॑: । यदि॑। त्वा॒। ग्राहि॑: । आ॒न॒शे । ताम् । ते॒ ।दे॒वा: । ब्रह्म॑णा । ना॒श॒य॒न्तु॒ ॥११३.३॥

Mantra without Swara
द्वादशधा निहितं त्रितस्यापमृष्टं मनुष्यैनसानि। ततो यदि त्वा ग्राहिरानशे तां ते देवा ब्रह्मणा नाशयन्तु ॥

द्वादशऽधा । निऽहितम् । त्रितस्य । अपऽमृष्टम् । मनुष्यऽएनसानि । तत: । यदि। त्वा। ग्राहि: । आनशे । ताम् । ते ।देवा: । ब्रह्मणा । नाशयन्तु ॥११३.३॥

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Meaning
१. (मनुष्यैनसानि) = मनुष्यों में आजानेवाले पाप (द्वादशधा) = बारह प्रकार के-पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों तथा मन और बुद्धि में (निहितम्) = स्थापित हुए हैं। हम इन्द्रियों, मन व बुद्धि से ही पाप कर बैठते हैं-('इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते')। ये सब पाप (त्रितस्य) = ज्ञान, कर्म व उपासना' का विस्तार करने से (अपमृष्टम्) = धुल जाते हैं। [त्रीन् तनोति] 'काम, क्रोध व लोभ'-इन तीनों को तैर जानेवालों के ये पाप नष्ट हो जाते हैं [त्रीन् तरति]। २. हे मनुष्य! (यदि) = यदि तुझमें (ग्राहिः) = गठिया आदि रोग (आनशे) = व्याप्त होते हैं तो (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष (ते) = तेरे (ताम्) = उस ग्राहीरूप रोग को (ब्रह्मणा नाशयन्तु) = ज्ञान के द्वारा नष्ट कर डालें। ज्ञान से पापों का परिमार्जन [सफ़ाया] होता है और तब पापमूलक सब रोग भी विनष्ट हो जाते हैं।
Essence
हम ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों तथा मन व बुद्धि से हो जानेवाले पापों को 'ज्ञान, कर्म व उपासना' में लगकर नष्ट करनेवाले हों। ज्ञान के द्वारा ग्राही आदि रोग दूर हो जाएँ।
Subject
मनुष्यैनसानि
Special
पूर्ण नीरोग, निष्पाप व ज्ञानी बनकर यह 'ब्रह्मा' बनता है। अगले दो सूक्तों का ऋषि यह 'ब्रह्मा' ही है।