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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/108/2

142 Sukta
5 Mantra
6/108/2
Devata- मेधा Rishi- शौनक् Chhanda- उरोबृहती Suktam- मेधावर्धन सूक्त
Mantra with Swara
मे॒धाम॒हं प्र॑थ॒मां ब्रह्म॑ण्वतीं॒ ब्रह्म॑जूता॒मृषि॑ष्टुताम्। प्रपी॑तां ब्रह्मचा॒रिभि॑र्दे॒वाना॒मव॑से हुवे ॥

मे॒धाम् । अ॒हम् । प्र॒थ॒माम् । ब्रह्म॑णऽवतीम् । ब्रह्म॑ऽजूताम् । ऋषि॑ऽस्तुताम् । प्रऽपी॑ताम् । ब्र॒ह्म॒चा॒रिऽभि॑: । दे॒वाना॑म् । अव॑से । हु॒वे॒ ॥१०८.२॥

Mantra without Swara
मेधामहं प्रथमां ब्रह्मण्वतीं ब्रह्मजूतामृषिष्टुताम्। प्रपीतां ब्रह्मचारिभिर्देवानामवसे हुवे ॥

मेधाम् । अहम् । प्रथमाम् । ब्रह्मणऽवतीम् । ब्रह्मऽजूताम् । ऋषिऽस्तुताम् । प्रऽपीताम् । ब्रह्मचारिऽभि: । देवानाम् । अवसे । हुवे ॥१०८.२॥

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Meaning
१. (अहं मेधाम्) = मैं मेधा बुद्धि को देवानाम् अवसे हुवे अपने जीवन में दिव्य गुणों के रक्षण के लिए पुकारता हूँ, उस मेधा को जो (प्रथमाम्) = सबसे मुख्य स्थान में स्थित है, (ब्रह्मण्व तीम्) = वेदज्ञानवाली है ब्(रह्मजूताम्) = ज्ञानियों से सेवित हुई है, (ऋषिष्टुताम्) = तत्वद्रष्टाओं से स्तुत हुई है और (ब्रह्मचारिभिः) = ज्ञान का चरण करनेवाले विद्यार्थियों से (प्रपीताम्) = प्रवर्धित हुई है, अथवा पी गई है, सम्यक् ग्रहण की गई है।
Essence
बुद्धि हमारे जीवनों में दिव्य गुणों के रक्षण का साधन बनती है। इसी से ज्ञान का वर्धन होता है और 'ज्ञान प्राप्त करना' ही इसकी वृद्धि का साधन बनता है।

 
Subject
मेधां प्रपीतां ब्रह्मचारिभिः'