Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/106/3

142 Sukta
3 Mantra
6/106/3
Devata- दूर्वाशाला Rishi- प्रमोचन Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- दूर्वाशाला सूक्त
Mantra with Swara
हि॒मस्य॑ त्वा ज॒रायु॑णा॒ शाले॒ परि॑ व्ययामसि। शी॒तह्र॑दा॒ हि नो॒ भुवो॒ऽग्निष्कृ॑णोतु भेष॒जम् ॥

हि॒मस्य॑ । त्वा॒ । जरायु॑णा। शाले॑ । परि॑ । व्य॒या॒म॒सि॒ । शी॒तऽह्र॑दा । हि । न॒: । भुव॑: । अ॒ग्नि: । कृ॒णो॒तु॒ । भे॒ष॒जम् ॥१०६.३॥

Mantra without Swara
हिमस्य त्वा जरायुणा शाले परि व्ययामसि। शीतह्रदा हि नो भुवोऽग्निष्कृणोतु भेषजम् ॥

हिमस्य । त्वा । जरायुणा। शाले । परि । व्ययामसि । शीतऽह्रदा । हि । न: । भुव: । अग्नि: । कृणोतु । भेषजम् ॥१०६.३॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. हे (शाले) = निवासस्थान ! (त्वा) = तुझे (हिमस्य जरायुणा) = हिम [शीतल जल] के वेष्टन से (परिव्ययामसि) = चारों ओर से घेरते हैं, तू (न:) = हमारे लिए (शीतहदा: भुव:) = शीतल जलवाले तालाब से युक्त हो। (हि) = निश्चय से इस स्थिति में (अग्नि:) = अग्नि (भेषजं कृणोतु) = हमारे रोगों के निवारण करने का साधन होकर रोगों को दूर करे।
Essence
घर तालाब आदि से घिरे हुए हों, जिससे बाहर की आग उस तक न पहुँच सके। घरों के अन्दर अग्नि भी भेषज बने-कष्टों को दूर करने का साधन बने।

 
Subject
हिमस्य जरायुणा
Special
इन घरों में शान्तिपूर्वक निवास करनेवाला 'शन्ताति' अगले सूक्त का ऋषि है।