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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/105/3

142 Sukta
3 Mantra
6/105/3
Devata- कासा Rishi- उन्मोचन Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- कासशमन सूक्त
Mantra with Swara
यथा॒ सूर्य॑स्य र॒श्मयः॑ परा॒पत॑न्त्याशु॒मत्। ए॒वा त्वं का॑से॒ प्र प॑त समु॒द्रस्यानु॑ विक्ष॒रम् ॥

यथा॑ । सूर्य॑स्य । र॒श्मय॑: । प॒रा॒ऽपत॑न्ति । आ॒शु॒ऽमत् । ए॒व । त्वम् । का॒से॒ । प्र । प॒त॒ । स॒मु॒द्रस्य॑ । अनु॑ । वि॒ऽक्ष॒रम् ॥१०५.३॥

Mantra without Swara
यथा सूर्यस्य रश्मयः परापतन्त्याशुमत्। एवा त्वं कासे प्र पत समुद्रस्यानु विक्षरम् ॥

यथा । सूर्यस्य । रश्मय: । पराऽपतन्ति । आशुऽमत् । एव । त्वम् । कासे । प्र । पत । समुद्रस्य । अनु । विऽक्षरम् ॥१०५.३॥

Meaning
१. (यथा) = जैसे उदय के पश्चात् (सूर्यस्य रश्मयः) = सूर्य की किरणें (आशुमत् परापतन्ति) = शीघ्रता से सुदूर पहुँच जाती हैं, (एव) = उसी प्रकार हे (कासे) = श्लेष्मरोग! (त्वम्) = तू (समुद्रस्य) = समुद्र के (विक्षरम् अनु) = विविध क्षरणवाले देश का लक्ष्य करके (अनु प्रपत) = शीघ्रता से दूर जा। इस पुरुष को छोड़कर तू सूर्य-रश्मियों को भौति शीघ्र समुद्रपर्यन्त चला जा।
Essence
कासा हमसे इसप्रकार दूर भाग जाए जैसेकि सूर्य-रश्मियों समुद्रपर्यन्त देशों में जा पहुँचती हैं।
Subject
यथा सूर्यस्य रश्मयः
Special
रोगों से बचने के लिए गृहों का उचित निर्माण नितान्त आवश्यक है। घर का उचित निर्माण करके रोगों को दूर रखनेवाला 'प्रमोचन' अगले सूक्त का ऋषि-द्रष्टा है।

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