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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/101/3

142 Sukta
3 Mantra
6/101/3
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- अथर्वाङ्नगिरा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- बलवर्धक सूक्त
Mantra with Swara
आहं त॑नोमि ते॒ पसो॒ अधि॒ ज्यामि॑व॒ धन्व॑नि। क्रम॑स्वर्श॑ इव रो॒हित॒मन॑वग्लायता॒ सदा॑ ॥

आ । अ॒हम् । त॒नो॒मि॒ । ते॒ । पस॑: । अधि॑ । ज्याम्ऽइ॑व । धन्व॑नि । क्रम॑स्व । ऋश॑:ऽइव । रो॒हित॑म् । अन॑वऽग्लायता । सदा॑ ॥१०१.३॥

Mantra without Swara
आहं तनोमि ते पसो अधि ज्यामिव धन्वनि। क्रमस्वर्श इव रोहितमनवग्लायता सदा ॥

आ । अहम् । तनोमि । ते । पस: । अधि । ज्याम्ऽइव । धन्वनि । क्रमस्व । ऋश:ऽइव । रोहितम् । अनवऽग्लायता । सदा ॥१०१.३॥

Meaning
१. प्रभु कहते हैं कि हे साधक! (अहम्) = मैं (ते पस:) = तेरे राष्ट्र को (आ तनोमि) = सब प्रकार से विस्तारवाला करता हूँ। (इव) = जिस प्रकार (अधिधन्वनि) = धनुष पर (ज्याम्) = डोरी को विस्तृत करते हैं। २. तू (सदा) = सर्वदा (अनवग्लायता) = बिना ग्लानि व थकावटवाले मन के साथ क्रमस्व शत्रुओं पर आक्रमण करनेवाला हो, (इव) = जैसेकि (ऋश:) = एक हिंसक पशु (रोहितम्) = मृगविशेष पर आक्रमण करता है। शत्रुओं को तू इसीप्रकार जीतनेवाला बन, जैसेकि एक हिंस्र पश हिरनों को जीत लेता है।
Essence
राजा सैनिकों को शस्त्रास्त्र से सुसज्जित रक्खे। शस्त्रास्त्र के अनुपात में ही राष्ट्र शक्तिशाली बनता है। सैनिक शक्ति के ठीक होने पर ही राष्ट्र की शक्तियों का विस्तार होता है।
Subject
अधिज्यामिव धन्वनि
Special
राष्ट्र का रक्षण करनेवाला यह व्यक्ति "जमदग्नि' कहलाता है। प्रजापति बैं जमदग्नि:-श० १३.२.२.१४। जमदग्नि ही अगले सूक्त का ऋषि है -

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