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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/1/3

142 Sukta
3 Mantra
6/1/3
Devata- सविता Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिपदा पिपीलिकमध्या पुरउष्णिक् Suktam- अमृतप्रदाता सूक्त
Mantra with Swara
स घा॑ नो दे॒वः स॑वि॒ता सा॑विषद॒मृता॑नि॒ भूरि॑। उ॒भे सु॑ष्टु॒ती सु॒गात॑वे ॥

स: । घ॒ । न॒: । दे॒व: । स॒वि॒ता । सा॒वि॒ष॒त् । अ॒मृता॑नि । भूरि॑ । उ॒भे इति॑ । सु॒स्तु॒ती इति॑ सु॒ऽस्तु॒ती । सु॒ऽगात॑वे ॥१.३॥

Mantra without Swara
स घा नो देवः सविता साविषदमृतानि भूरि। उभे सुष्टुती सुगातवे ॥

स: । घ । न: । देव: । सविता । साविषत् । अमृतानि । भूरि । उभे इति । सुस्तुती इति सुऽस्तुती । सुऽगातवे ॥१.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (स:) = वह (देव:) = प्रकाशमय (सविता) = प्रेरक प्रभु (घ) = निश्चय से (न:) = हमारे लिए भरि खुब ही (अमृतानि साविषत्) = अमृतत्वों को प्राप्त कराता है-हमें नीरोग जीवनवाला बनाता है। २. (उभे) = दोनों (सुष्टुती) = उत्तम स्तुतियों के-प्रात: व सार्यकालीन स्तुतियों के (सुगातवे) = उत्तम गायन के लिए प्रभु हमें नीरोगता प्रदान करते हैं। ('उभे सुष्टुती सुगातवे') = का यह अर्थ भी सुन्दर है कि दोनों उत्तम स्तुत्य मार्गों से चलने के लिए। हम 'अभ्युदय व निःश्रेयस', 'इहलोक व परलोक', 'शरीर व आत्मा', 'शक्ति व ज्ञान' दोनों का ध्यान करते हुए जीवन में आगे बढ़ें।
Essence
प्रभु हमें खुब ही नीरोग बनाते हैं, जिससे हम प्रात:सायं सम्यक् प्रभुस्तवन कर पाएँ। वस्तुतः प्रभुस्तवन ही नीरोगता का साधन हो जाता है।
Subject
उभे सुष्टुती सुगातवे