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Atharvaveda - Mantra 9

Atharvaveda 5/8/9

31 Sukta
9 Mantra
5/8/9
Devata- इन्द्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- षट्पदा द्व्यनुष्टुब्गर्भा जगती Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
अत्रै॑नानिन्द्र वृत्रहन्नु॒ग्रो मर्म॑णि विध्य। अत्रै॒वैना॑न॒भि ति॒ष्ठेन्द्र॑ मे॒द्यहं तव॑। अनु॑ त्वे॒न्द्रा र॑भामहे॒ स्याम॑ सुम॒तौ तव॑ ॥

अत्र॑ । ए॒ना॒न् । इ॒न्द्र॒ । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । उ॒ग्र: । मर्म॑णि । वि॒ध्य॒ । अत्र॑ । ए॒व । ए॒ना॒न् । अ॒भि । ति॒ष्ठ॒ । इन्द्र॑ । मे॒दी । अ॒हम् । तव॑ । अनु॑ । त्वा॒ । इ॒न्द्र॒ । आ । र॒भा॒म॒हे॒ । स्याम॑ । सु॒ऽम॒तौ । तव॑ ॥८.९॥

Mantra without Swara
अत्रैनानिन्द्र वृत्रहन्नुग्रो मर्मणि विध्य। अत्रैवैनानभि तिष्ठेन्द्र मेद्यहं तव। अनु त्वेन्द्रा रभामहे स्याम सुमतौ तव ॥

अत्र । एनान् । इन्द्र । वृत्रऽहन् । उग्र: । मर्मणि । विध्य । अत्र । एव । एनान् । अभि । तिष्ठ । इन्द्र । मेदी । अहम् । तव । अनु । त्वा । इन्द्र । आ । रभामहे । स्याम । सुऽमतौ । तव ॥८.९॥

Meaning
१. प्रभु कहते हैं कि (अत्र) = यहाँ-इसी जीवन में (एनान्) = इन शत्रुओं को हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष! (वृत्रहन्) = इन वासनाओं को विनष्ट करनेवाले पुरुष! तू (मर्मणि विध्य) = मर्मस्थलों में विद्ध करनेवाला हो। (अत्र एव) = यहाँ, इस जीवकाल में ही (एनान् अभितिष्ठ) = इन्हें पादाक्रान्त कर। हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष | (अहम्) = मैं [प्रभु] तव (मेदी) = तुझ जितेन्द्रिय पुरुष का स्नेही बनता हूँ। प्रभु जितेन्द्रिय के ही मित्र होते हैं। २. एक जितेन्द्रिय पुरुष उत्तर देता है कि हे (इन्द्र) = हमारे शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो! हम (त्वा अनु आरभामहे) = आपके पीछे-पीछे ही आपकी सहायता से ही इस शत्रु-विनाश के कार्य को प्रारम्भ करते हैं। हम सदा तव-आपकी सुमतौ स्याम-कल्याणी मति में हों।
Essence
प्रभु का आदेश है कि हम इस जीवन में काम-क्रोध आदि शत्रुओं का पराभव करने के लिए यत्नशील हों, अत: हम प्रभु की सहायता से इन्हें परास्त करनेवाले बनें।
Subject
प्रभु की सहायता से काम आदि शत्रुओं का विनाश
Special
सब शत्रुओं का पराभव करके यह 'ब्रह्म' का सच्चा पुत्र 'ब्रह्मा' बनता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है।

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