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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 5/8/6

31 Sukta
9 Mantra
5/8/6
Devata- इन्द्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- आस्तारपङ्क्तिः Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
यदि॑ प्रे॒युर्दे॑वपु॒रा ब्रह्म॒ वर्मा॑णि चक्रि॒रे। त॑नू॒पानं॑ परि॒पाणं॑ कृण्वा॒ना यदु॑पोचि॒रे सर्वं॒ तद॑र॒सं कृ॑धि ॥

यदि॑। प्र॒ऽई॒यु: । दे॒व॒ऽपु॒रा: । ब्रह्म॑ । वर्मा॑णि । च॒क्रि॒रे । त॒नू॒ऽपान॑म् । प॒रि॒ऽपान॑म् । कृ॒ण्वा॒ना: । यत् । उ॒प॒ऽऊ॒चि॒रे । सर्व॑म् । तत् । अ॒र॒सम् । कृ॒धि॒॥८.६॥

Mantra without Swara
यदि प्रेयुर्देवपुरा ब्रह्म वर्माणि चक्रिरे। तनूपानं परिपाणं कृण्वाना यदुपोचिरे सर्वं तदरसं कृधि ॥

यदि। प्रऽईयु: । देवऽपुरा: । ब्रह्म । वर्माणि । चक्रिरे । तनूऽपानम् । परिऽपानम् । कृण्वाना: । यत् । उपऽऊचिरे । सर्वम् । तत् । अरसम् । कृधि॥८.६॥

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Meaning
१. (यदि) = यदि (देवपुरा:) = देवनगरियों में निवास करनेवाले व्यक्ति (प्रेयुः) = [प्र ईयु:] शत्रु पर आक्रमण करने के लिए चलते हैं तो वे (ब्रह्म वर्माणि) = ज्ञान व प्रभु को अपना कवच (चक्रिरे) = करते हैं-ब्रह्म-कवच से ये अपना रक्षण करनेवाले होते हैं। २. ज्ञानपूर्वक तथा प्रभु स्मरणपूर्वक (तनूपानम्) = अपने शरीरों का रक्षण तथा (परिपाणम्) = समन्तात् नगर व राष्ट्र का रक्षण (कृण्वाना:) = करते हुए ये (तत् सर्वम् अरसं कृधि) = उस सबको नि:सार कर देते हैं, (यत्) = जो (उप उचिरे) = हमारे विषय में शत्रुओं ने हीन बातें कही हैं। ['कृधि'-एकवचनं छान्दसम्] | शत्रुओं की डींगों को, अभिमानभरी बातों को उन्हें परास्त करके व्यर्थ कर देते हैं।
Essence
देव लोग पहले तो आक्रमण करते ही नहीं। यदि उन्हें आक्रमण करना ही पड़ जाए तो ये प्रभु को अपना कवच बनाते हैं तथा ज्ञानपूर्वक शरीरों व राष्ट्र के रक्षण की व्यवस्था करते हुए शत्रुओं को परास्त करके उनकी अभिमानभरी बातों को नि:सार कर देते हैं।

 
Subject
यदि प्रेयुः