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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 5/8/4

31 Sukta
9 Mantra
5/8/4
Devata- इन्द्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- भुरिक्पथ्यापङ्क्तिः Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
अति॑ धावतातिसरा॒ इन्द्र॑स्य॒ वच॑सा हत। अविं॒ वृक॑ इव मथ्नीत॒ स वो॒ जीव॒न्मा मो॑चि प्रा॒णम॒स्यापि॑ नह्यत ॥

अति॑ । धा॒व॒त॒ । अ॒ति॒ऽस॒रा॒: । इन्द्र॑स्य । वच॑सा । ह॒त॒ । अवि॑म् । वृक॑:ऽइव । म॒थ्नी॒त॒ । स: । व॒: । जीव॑न् । मा । मो॒चि॒। प्रा॒णम् । अ॒स्य । अपि॑ । न॒ह्य॒त॒ ॥८.४॥

Mantra without Swara
अति धावतातिसरा इन्द्रस्य वचसा हत। अविं वृक इव मथ्नीत स वो जीवन्मा मोचि प्राणमस्यापि नह्यत ॥

अति । धावत । अतिऽसरा: । इन्द्रस्य । वचसा । हत । अविम् । वृक:ऽइव । मथ्नीत । स: । व: । जीवन् । मा । मोचि। प्राणम् । अस्य । अपि । नह्यत ॥८.४॥

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Meaning
१. हे (अतिसरा:) = अतिशयेन गतिशील पुरुषो! (अतिधावत) = तुम गति द्वारा अपने जीवन को अति शुद्ध बनाओ। (इन्द्रस्य वचसा हत) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के वचन से-उसके आदेश के अनुसार सम्पूर्ण समाज के शत्रु को मार डालो। यदि उसके सुधरने की आशा नहीं है तो उसे प्राणों से वञ्चित करना ठीक ही है। २. (इव) = जैसे (वृक: अविम्) = एक भेड़िया भेड़ का मथन कर डालता है, इसप्रकार तुम इस समाज-शत्रु को मनीत कुचल डालो। (सः) = वह (वः) = तुमसे (जीवन् मा मोचि) = जीता हुआ न छुट जाए। (अस्य) = इसके (प्राणम्) = प्राण को (अपिनहात) = बाधैं डालो। इसकी प्राणशक्ति इसप्रकार नियन्त्रित कर दी जाए कि यह समाज की कुछ भी हानि न कर सके।
Essence
हम गति द्वारा अपने जीवन को शुद्ध बनाएँ। प्रभु के आदेश के अनुसार समाज शत्रु को उचित दण्ड देना आवश्यक हो तो वह दिया जाए अथवा उसकी गतिविधियों को पूर्णरूप से नियन्त्रित कर दिया जाए।
Subject
इन्द्रस्य वचसा हत