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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 5/8/3

31 Sukta
9 Mantra
5/8/3
Devata- विश्वे देवाः Rishi- अथर्वा Chhanda- भुरिक्पथ्यापङ्क्तिः Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
यद॒साव॒मुतो॑ देवा अदे॒वः संश्चिकी॑र्षति। मा तस्या॒ग्निर्ह॒व्यं वा॑क्षी॒द्धवं॑ दे॒वा अ॑स्य॒ मोप॒ गुर्ममै॒व हव॒मेत॑न ॥

यत् । अ॒सौ । अ॒मुत॑: । दे॒वा॒: । अ॒दे॒व: । सन् । चिकी॑र्षति । मा । तस्य॑ । अ॒ग्नि: । ह॒व्यम् । वा॒क्षी॒त् । हव॑म् । दे॒वा: । अ॒स्य॒ । मा । उप॑ । गु॒: । मम॑ । ए॒व । हव॑म् । आ । इ॒त॒न॒ ॥८.३॥

Mantra without Swara
यदसावमुतो देवा अदेवः संश्चिकीर्षति। मा तस्याग्निर्हव्यं वाक्षीद्धवं देवा अस्य मोप गुर्ममैव हवमेतन ॥

यत् । असौ । अमुत: । देवा: । अदेव: । सन् । चिकीर्षति । मा । तस्य । अग्नि: । हव्यम् । वाक्षीत् । हवम् । देवा: । अस्य । मा । उप । गु: । मम । एव । हवम् । आ । इतन ॥८.३॥

Meaning
१. यदि कोई हमारा विरोध करता है तो प्रभु ठीक मार्ग पर चलनेवाले हम लोगों का रक्षण करें और उस अदेववृत्ति के व्यक्ति को उचित दण्ड दें। हे (देवा:) = देवो! (यत्) = जो (असौ) = वह (अदेवः सन्) = अदेव [न देने की] वृत्तिवाला होता हुआ व्यक्ति (अमुत:) = उस सुदूर प्रदेश से हमारे विरोधी पक्ष से (चिकीर्षति) = हमारा हानिकर कर्म करना चाहता है तो (अग्निः) = वे प्रभु (तस्य) = उसके (हव्यं मा वाक्षीत्) = हव्यपदार्थ का वहन न करें-प्रभु उसे आवश्यक पदार्थों से वञ्चित करें। वह इसप्रकार दरिद्रता में व्यथित हो कि उसमें पर-पीड़न की शक्ति ही न रहे। २. (देवाः) = विद्वान् लोग (अस्य हवं मा उपगु:) = उसकी पुकार को सुनकर उसे प्रास न हों-विद्वानों से उसका बहिष्कार किया जाए। ये विद्वान् (मम एव हवं एतन) = मेरी ही पुकार पर प्राप्त हों। इसप्रकार यह अदेव सामाजिक बहिष्कार की पीड़ा को अनुभव करे।

 
Essence
हे देवो! यदि कोई अदेव वृत्ति का व्यक्ति देववृत्ति के व्यक्तियों को पीड़ित करना चाहता है तो प्रभु उसे हव्य पदार्थ प्राप्त न कराके उसे दण्डित करें तथा विद्वान् लोग उसके आमन्त्रण को अस्वीकार करके उसे सामाजिक बहिष्कार की पीड़ा को अनुभव कराएँ।

 
Subject
अदेव के सुधार के लिए

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